छोड़कर सामग्री पर जाएँ
Home » Blog » UNSC वीटो पावर खत्म करो: मलेशिया ने P5 को दी खुली चुनौती, UN महासभा में गूंजी आवाज़

UNSC वीटो पावर खत्म करो: मलेशिया ने P5 को दी खुली चुनौती, UN महासभा में गूंजी आवाज़

UNSC वीटो पावर खत्म करो: मलेशिया ने P5 को दी खुली चुनौती, UN महासभा में गूंजी आवाज़

न्यूयॉर्क की उस विशाल सभागार में, जहाँ दुनिया के नेता हर साल बड़े-बड़े वादे करके लौट जाते हैं, इस बार एक आवाज़ अलग थी। मलेशिया के विदेश मंत्री दातुक सेरी मोहम्मद हसन ने UN महासभा (UNGA) की आम बहस में खड़े होकर वो बात कही जो बहुत से देश सोचते हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते — संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वीटो पावर को सिर्फ चुनौती नहीं दी जानी चाहिए, इसे जड़ से खत्म किया जाना चाहिए। यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह उस पूरे वैश्विक ढाँचे को हिलाने की माँग थी जिसे 1945 के बाद से P5 देशों ने अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा है।

हसन ने अपने राष्ट्रीय बयान में साफ शब्दों में कहा कि परिषद की सदस्यता बढ़ाने से उसकी बुनियादी कमियाँ दूर नहीं होंगी। महासभा के हर सदस्य देश को वीटो के इस्तेमाल पर सवाल उठाना चाहिए और इसका कड़ा विरोध करना चाहिए — खासकर तब, जब मानवता के खिलाफ अपराध हो रहे हों और एक अकेला देश अपने राजनीतिक हितों की खातिर पूरी दुनिया की इच्छाशक्ति को वीटो से दफन कर दे। यह सुनने में आदर्शवादी लग सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि यह माँग आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी और प्रासंगिक है।

समझिए असली खेल। UNSC में 15 सदस्य होते हैं — पाँच स्थायी (P5) और दस अस्थायी। P5 यानी अमेरिका, रूस, चीन, यूके और फ्रांस। इन पाँचों के पास वीटो पावर है, जो एक ऐसा हथियार है जिसके सामने बाकी 190 से ज़्यादा देशों की आवाज़ बेमानी हो जाती है। अगर P5 का कोई एक भी देश किसी प्रस्ताव के खिलाफ वोट दे दे, तो वह प्रस्ताव — चाहे दुनिया के बाकी सभी देश उसके पक्ष में हों — रद्द हो जाता है। बस। खेल खत्म।

यही वह ढाँचा है जिसने दशकों से वैश्विक न्याय को बंधक बनाए रखा है। रूस ने सीरिया पर दर्जनों प्रस्ताव वीटो किए। चीन ने म्यांमार पर। अमेरिका ने गाजा पर। हर बार एक अकेले देश ने पूरी मानवता की आवाज़ को दबा दिया। मोहम्मद हसन ने इसी सच्चाई को UNGA के मंच से उजागर किया।

और यहाँ भारत का नज़रिया समझना ज़रूरी है। भारत दशकों से UNSC में स्थायी सीट और सुधार की माँग करता आया है। 140 करोड़ की आबादी, दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, और वैश्विक दक्षिण की सबसे बुलंद आवाज़ — फिर भी भारत को स्थायी सदस्यता से वंचित रखा गया है। यह महज एक राजनयिक चूक नहीं, यह उस पुरानी दुनिया की विरासत है जो 1945 में जंग जीतने वालों ने अपने लिए बनाई थी। आज जब मलेशिया जैसे देश भी खुलकर वीटो को चुनौती दे रहे हैं, तो यह संकेत है कि ग्लोबल साउथ की आवाज़ अब नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती।

हसन ने UN की विश्वसनीयता पर भी सीधा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह संस्था अपना भरोसा खो रही है और इसे केवल ठोस कदमों से बहाल किया जा सकता है — अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन सुनिश्चित करके और यह विश्वास दिलाकर कि हर देश की आवाज़ मायने रखती है। यह बात सुनने में सरल लगती है। लेकिन जब रूस यूक्रेन पर हमला करे और खुद ही UNSC में वीटो से बच निकले, जब चीन अपने पड़ोसियों को धमकाए और परिषद में खामोशी छाई रहे — तब यह “सरल बात” एक क्रांतिकारी माँग बन जाती है।

वैश्विक व्यवस्था बदल रही है। एशिया उठ रहा है। भारत नेतृत्व कर रहा है। G20 की अध्यक्षता हो, SCO हो, या BRICS — भारत ने दिखाया है कि नई विश्व व्यवस्था में उसकी भूमिका केंद्रीय होगी। ऐसे में UNSC सुधार केवल एक राजनयिक एजेंडा नहीं रह गया — यह एक सभ्यतागत न्याय की माँग है। उन देशों के लिए जो सदियों तक औपनिवेशिक शोषण झेलते रहे और अब एक नई, न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाना चाहते हैं।

मलेशिया की यह आवाज़ अकेली नहीं है। और यह आवाज़ अब और दबाई नहीं जा सकती। वक्त आ गया है कि P5 का वह एकाधिकार — जो 1945 की जंग की विरासत है — 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया के सामने झुके। इतिहास उन्हीं के साथ होता है जो सही वक्त पर सही बात कहने की हिम्मत रखते हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *