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SCO संस्कृति मंत्रियों की बैठक में भारत की दमदार उपस्थिति — ‘वसुधैव कुटुंबकम’ से गूंजा बिश्केक

SCO संस्कृति मंत्रियों की बैठक में भारत की दमदार उपस्थिति — 'वसुधैव कुटुंबकम' से गूंजा बिश्केक

बिश्केक की उस बैठक में जब गजेंद्र सिंह शेखावत ने मंच संभाला, तो पूरे हॉल में एक प्राचीन संदेश गूंज उठा — “वसुधैव कुटुंबकम।” किर्गिस्तान की राजधानी में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के संस्कृति मंत्रियों की बैठक में भारत ने सिर्फ हिस्सा नहीं लिया — भारत ने दिशा तय की।

सभ्यता की आवाज़, मंच पर

केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बिश्केक में SCO के सदस्य देशों के सामने भारत की उस विरासत को सामने रखा, जो हज़ारों साल पुरानी है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संस्कृति महज़ परंपरा नहीं है — यह संवाद का सबसे शक्तिशाली माध्यम है, आपसी विश्वास की नींव है और सतत विकास का रास्ता है। यह कोई diplomatic boilerplate नहीं था — यह भारत की genuine civilizational confidence थी, जो दुनिया के सामने खुलकर बोल रही थी।

शेखावत ने X (पूर्व में Twitter) पर लिखा कि भारत संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के कालजयी विचार को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह समर्पित है। यह वही विचार है जो भारत ने G20 की अध्यक्षता के दौरान भी दुनिया के सामने रखा था — और आज SCO के मंच पर एक बार फिर भारत उसी सोच का झंडा उठाए खड़ा है।

साझा विरासत, साझा भविष्य

बैठक में भारत ने SCO सदस्य देशों के बीच साझा सभ्यतागत विरासत को संजोने और आपसी सांस्कृतिक सहयोग को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। यह कोई symbolic gesture नहीं था। Central Asia और South Asia के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, व्यापारिक और आध्यात्मिक संबंध रहे हैं — बौद्ध धर्म का प्रसार हो, सिल्क रूट की यादें हों, या सूफ़ी परंपराओं की साझी धरोहर — भारत इस पूरे इतिहास का केंद्र रहा है। शेखावत ने इसी धागे को पकड़कर आगे बढ़ने की बात की, और यही भारत की असली soft power है।

यह वह ताकत है जो किसी missile से नहीं, किसी treaty से नहीं — बल्कि हज़ारों साल की जीती-जागती सभ्यता से आती है। और दुनिया इसे notice कर रही है।

SCO: एक बड़ा मंच, बड़ी ज़िम्मेदारी

SCO आज दुनिया के सबसे प्रभावशाली बहुपक्षीय संगठनों में से एक है। साल 2001 में रूस, चीन, किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़बेकिस्तान ने मिलकर इसकी नींव रखी थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में स्थायी सदस्य बने, और अब ईरान और बेलारूस के जुड़ने से यह संगठन और भी विस्तृत हो गया है। आर्थिक सहयोग से लेकर सुरक्षा तक, SCO का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

इस विशाल मंच पर भारत की भूमिका सिर्फ एक सदस्य की नहीं है — भारत एक civilizational anchor की तरह काम कर रहा है। जहाँ कुछ देश इस मंच को geopolitical chess की तरह इस्तेमाल करते हैं, वहीं भारत संस्कृति और मानवीय जुड़ाव को केंद्र में रखता है। यही फर्क है। यही भारत की पहचान है।

असली दाँव क्या है?

बिश्केक की इस बैठक को सिर्फ एक diplomatic event की तरह देखना गलत होगा। यह उस बड़ी कहानी का हिस्सा है जिसमें भारत अपनी cultural diplomacy को एक strategic tool की तरह इस्तेमाल कर रहा है। जब दुनिया polarized हो रही हो, जब geopolitical tensions बढ़ रहे हों, तब संस्कृति का यह पुल बेहद ज़रूरी है। और भारत — अपनी हज़ारों साल पुरानी विरासत के साथ — इस पुल को बनाने में सबसे सक्षम है।

जो देश सिर्फ अपनी GDP की बात करते हैं, वे एक आयाम देखते हैं। भारत GDP भी बढ़ा रहा है और साथ ही दुनिया को यह भी याद दिला रहा है कि असली शक्ति वहाँ होती है जहाँ दिल जुड़ते हैं। बिश्केक में गजेंद्र सिंह शेखावत की आवाज़ में वही भारत बोल रहा था — आत्मविश्वास से भरा, अपनी जड़ों से जुड़ा और दुनिया को एक साथ लेकर चलने का हौसला रखने वाला।

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