यह thesis सीधी और स्पष्ट है — पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जो हो रहा है, वह किसी “आंतरिक कानून-व्यवस्था की समस्या” का मामला नहीं है। यह एक कब्जाई हुई फौज द्वारा अपने ही लोगों का नरसंहार है। और दुनिया की तथाकथित “मानवाधिकार” लॉबी मुँह बंद किए बैठी है।
5 जून को रावलकोट से शुरू हुए ‘अवामी हुकूक लॉन्ग मार्च’ पर पाकिस्तानी सेना ने सीधी गोलियाँ और आंसू गैस के गोले दागे। यह मार्च रावलकोट से मुजफ्फराबाद की ओर बढ़ रहा था — बुनियादी मानवाधिकारों और सम्मान की माँग लेकर। जवाब में मिला — बुलेट। अब तक 80 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, और पिछले 24 घंटों में अकेले रावलकोट और मीरपुर में 19 से अधिक लोगों की जानें गई हैं।
यह संख्या सिर्फ आँकड़ा नहीं है। हर गिनती के पीछे एक इंसान है, एक परिवार है, एक सपना है जो पाकिस्तानी फौज की गोली ने खत्म कर दिया।
JAAC कोर कमेटी के सदस्य और प्रवक्ता उमर नज़ीर कश्मीरी के भाई उस्मान नजीर को पाकिस्तानी सेना ने रावलकोट में गोली मारकर शहीद कर दिया। ‘अवामी एक्शन कमेटी’ ने उनकी याद में लिखा — “आपके शरीर पर लगी गोलियाँ आपके हौसले को नहीं तोड़ सकीं… आपकी कुर्बानी हमेशा याद रखी जाएगी।” यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं है — यह एक जनता का प्रतिरोध का ऐलान है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए तीन पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है।
जनरल असीम मुनीर की फौज ने PoK को एक खुले कत्लगाह में बदल दिया है। 1919 में जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने निहत्थे भारतीयों पर गोलियाँ चलाई थीं — आज उसी तर्ज पर पाकिस्तानी वर्दी वाले अपने ही “नागरिकों” पर गोलियाँ बरसा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब एक विदेशी साम्राज्य था, आज एक नाकाम और क्रूर राज्य है जो अपनी जनता को दुश्मन मानता है।
भारत को इस मुद्दे को UN Human Rights Council से लेकर हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना चाहिए। PoK की जनता की आवाज़ दुनिया तक पहुँचानी होगी — क्योंकि यह सिर्फ उनकी लड़ाई नहीं, यह उस ज़मीन की लड़ाई है जो हमेशा से भारत माता का हिस्सा रही है।
PoK में खून बह रहा है। दुनिया चुप है। भारत को नहीं रहना चाहिए।

