पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) की धरती इन दिनों उबल रही है। महंगाई, राशन संकट और पाकिस्तानी प्रशासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ ज्वाइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन अब हिंसक रूप ले चुका है। रावलकोट में सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में कम से कम 11 लोगों की जान जा चुकी है, सैकड़ों घायल हैं और हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया है। शहबाज-मुनीर सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए आटा और ईंधन की सप्लाई तक रोक दी है, इंटरनेट बंद कर दिया गया है — यानी हर वो हथकंडा अपनाया जा रहा है जो एक दमनकारी राज्य अपनी ही जनता के खिलाफ अपनाता है। यह तस्वीर साफ बताती है कि PoJK में पाकिस्तान का नैतिक और प्रशासनिक आधार खोखला हो चुका है।
इसी माहौल में JAAC ने एक बेहद अहम चेतावनी दी है — अगर पाकिस्तान ने उनकी मांगें नहीं मानीं, तो वे “दूसरे रास्ते” अपनाने पर मजबूर होंगे। इस “दूसरे रास्ते” का इशारा साफ था: भारत की ओर। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक भावनात्मक बयान है, या वाकई कोई कानूनी और संवैधानिक रास्ता मौजूद है जिससे PoJK बिना युद्ध के भारत का हिस्सा बन सके? यह सवाल आज हर उस भारतीय के मन में है जो अपने देश के अधूरे सपने को पूरा होते देखना चाहता है।
इस पूरे मसले को समझने के लिए हमें इतिहास की उस तारीख पर वापस जाना होगा जो सब कुछ तय कर देती है — अक्टूबर 1947। भारतीय सेना के मेजर जनरल (रिटायर्ड) अश्विनी कुमार सिवाच इस विषय पर बेहद स्पष्ट हैं: कानूनी दृष्टिकोण से PoJK पहले से ही भारत का अभिन्न अंग है। महाराजा हरि सिंह ने जब इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर किए, तो पूरे जम्मू-कश्मीर का — बिना किसी अपवाद के — भारत में विलय हो गया था। पाकिस्तान ने जो कब्जा किया, वह अंतरराष्ट्रीय कानून की नजर में आज भी एक अवैध कब्जा है, न कि कोई वैध क्षेत्रीय अधिकार।
इस ऐतिहासिक सच्चाई को भारत की संसद ने भी 1994 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित करके पुष्ट किया था। यानी यह कोई एक पार्टी का एजेंडा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की संवैधानिक सहमति है। जनरल सिवाच बताते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को नए क्षेत्रों को संघ में शामिल करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन चूंकि PoJK पहले से ही कानूनी रूप से भारत का हिस्सा है, इस अनुच्छेद की शायद ही जरूरत पड़े। असली काम तो प्रशासनिक और कूटनीतिक स्तर पर होना है।
तो फिर व्यावहारिक रास्ता क्या है? जनरल सिवाच के अनुसार, PoJK के निवासियों को सबसे पहले एक औपचारिक लोकतांत्रिक प्रस्ताव भेजना होगा, जिसमें वे भारतीय संविधान के तहत शासित होने की इच्छा व्यक्त करें। इसके बाद एक जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू हो सकती है जो राजनयिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर PoJK को भारत से जोड़ने का आधार तैयार करेगी। यह कोई नया अंतरराष्ट्रीय विलय नहीं होगा — यह तो बस 1947 के मूल एक्सेशन के तहत वहां के लोगों के मौलिक अधिकारों की वापसी होगी। और जब दुनिया के सामने वहां की जनता की इच्छा स्पष्ट हो जाए, तो भारत को रोकने की ताकत किसी में नहीं होगी।
प्रशासनिक दृष्टि से भी रास्ता पहले से तैयार है। जिस तरह 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत इस क्षेत्र का पुनर्गठन हुआ, उसी ढांचे में PoJK को जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में शामिल किया जा सकता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारतीय संसद और विधानसभा में PoJK के लिए सीटें पहले से आरक्षित हैं — पिछले 78 वर्षों से खाली पड़ी हैं, मानो इंतजार कर रही हों। यह एक संवैधानिक संकेत है कि भारत ने कभी भी PoJK को अपने दायरे से बाहर नहीं माना।
जमीनी हकीकत की बात करें तो PoJK के स्थानीय निवासी पाकिस्तानी प्रशासन को एक कब्जे की ताकत मानते हैं, न कि अपनी सरकार। पाकिस्तानी सेना और नौकरशाही के शोषण से तंग आ चुके इन लोगों की नजरें अब भारत के जम्मू-कश्मीर की ओर टिकी हैं, जहां अनुच्छेद 370 हटने के बाद तेज विकास और शांति का एक नया दौर शुरू हुआ है। नई सड़कें, निवेश, पर्यटन और रोजगार — यह सब PoJK के लोगों को भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित कर रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जब कहा था कि “PoK के लोग विकास देखकर खुद भारत में शामिल होना चाहेंगे,” तो वह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं था — वह एक रणनीतिक दूरदर्शिता थी जो आज सच होती दिख रही है।
हालांकि, रास्ता उतना सरल नहीं जितना दिखता है। डिफेंस एक्सपर्ट मानते हैं कि फिलहाल PoJK में भारत के साथ विलय की मांग सीमित स्तर पर है — गुस्सा पाकिस्तान के खिलाफ जरूर है, लेकिन भारत-समर्थक भावना को अभी और मजबूत होना है। अगर पाकिस्तान ने इस आंदोलन को और बर्बरता से कुचला, तो वहां के लोग भारत की ओर और तेजी से मुड़ेंगे — और यही वह क्षण होगा जब भारत को कूटनीतिक समर्थन देकर उस इलाके के एकीकरण का आधार तैयार करना होगा। साथ ही, भारत को पाकिस्तानी सेना को आर्थिक और कूटनीतिक दबाव से लगातार कमजोर करते हुए इस्लामाबाद पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना होगा, ताकि वह भारत की किसी भी कार्रवाई का प्रभावी विरोध न कर सके।
यह एक ऐसा सपना है जो 1947 से अधूरा है — लेकिन इतिहास, संविधान और जमीनी हकीकत तीनों भारत के पक्ष में खड़े हैं। PoJK की वापसी किसी युद्ध की मांग नहीं करती; वह मांग करती है धैर्य की, रणनीति की, और उस राष्ट्रीय संकल्प की जो हर भारतीय के दिल में जलता है। जब वहां की जनता खुद अपनी आवाज उठाएगी, तो इतिहास का वह पन्ना पलटेगा जो 78 साल से रुका हुआ है — और भारत माता एक बार फिर पूर्ण होगी।

