संसद का मानसून सत्र इस बार महज बजट और नीतिगत बहसों तक सीमित नहीं रहने वाला। मोदी सरकार एक ऐसा राजनीतिक धमाका करने की तैयारी में है जिसकी आहट से विपक्ष की नींद पहले ही उड़ चुकी है। दो बड़े मुद्दे — FCRA संशोधन बिल और परिसीमन बिल — इस सत्र में केंद्र की राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं, और इन दोनों का असर सिर्फ संसद की चारदीवारी तक नहीं, बल्कि भारत की भू-राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी समीकरणों तक पहुंचेगा।
पहले बात करते हैं FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act के संशोधन की। सरकार इस बिल को जल्द से जल्द पास कराने की कोशिश में है। इस बिल के तहत विदेशी चंदे के नियम इतने सख्त हो जाएंगे कि फॉरेन फंडिंग की आड़ में चलने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। अब विदेशी फंडिंग लेने वाली हर संस्था को पाई-पाई का हिसाब गृह मंत्रालय को देना होगा, एक तय बैंक अकाउंट के जरिए ही पैसा आएगा, सालाना ऑडिट अनिवार्य होगा, और पांच साल के भीतर लाइसेंस रिन्यू न करने पर रजिस्ट्रेशन स्वतः रद्द माना जाएगा। विधायक, जज, सरकारी कर्मचारी, अखबार और राजनीतिक दल — सभी को विदेशी चंदे से पूरी तरह दूर रखा गया है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार चर्च और स्कूलों पर कब्जा करना चाहती है। लेकिन बिल में काले और सफेद अक्षरों में लिखा है — धार्मिक संपत्तियों का चरित्र नहीं बदलेगा। फिर भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस पर जमकर हल्ला मचा रहे हैं। असली डर कहीं और है।
असली डर है उन NGO नेटवर्क्स का, जो दशकों से विदेशी फंडिंग पर पलते आए हैं और जिनकी गतिविधियां कभी-कभी भारत के विकास और संप्रभुता के विरुद्ध जाती रही हैं। जून 2014 में Intelligence Bureau ने एक बेहद अहम रिपोर्ट तैयार की थी — मोदी सरकार के सत्ता में आने से ठीक पहले — जिसमें Greenpeace, Amnesty और ActionAid जैसे NGO पर आरोप लगाए गए थे कि वे परमाणु संयंत्रों, कोयला बिजली परियोजनाओं, खनन और डैम प्रोजेक्ट्स के खिलाफ काम कर रहे हैं। IB की रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि इन गतिविधियों से भारत की GDP ग्रोथ दो से तीन प्रतिशत तक कम हो रही है। यह रिपोर्ट PMO, गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय तक पहुंची थी। और अब PM मोदी वही कर रहे हैं जो राष्ट्रहित में सबसे जरूरी है।
इसी सत्र में गृह मंत्रालय ने FCRA के तहत 105 अनुमत गतिविधियों की एक सूची जारी की है — सिर्फ इन्हीं के लिए विदेशी डोनेशन लिया जा सकता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात: धर्मांतरण से जुड़ी किसी भी गतिविधि के लिए विदेशी फंड लेना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। किसी व्यक्ति या समुदाय को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करना, प्रोत्साहित करना या सहायता देना — सब कुछ अपराध की श्रेणी में आएगा। यह कदम हिंदू समाज की एक पुरानी और जायज चिंता का सीधा जवाब है।
अब एक विडंबना देखिए। आज कांग्रेस इस बिल का सबसे मुखर विरोध कर रही है। लेकिन फरवरी 2012 में कुडनकुलम परमाणु परियोजना विवाद के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खुद कहा था कि अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंडिंग पाने वाले NGO भारत के विकास में बाधा बनते हैं। कांग्रेस आज अपने ही पूर्व प्रधानमंत्री की बात को नकार रही है। यह सिर्फ राजनीतिक पाखंड नहीं, यह अपनी ही विरासत से विश्वासघात है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया भी बेहद revealing है। Republican सीनेटर James Risch ने FCRA नियमों पर सवाल उठाए हैं। Republican सीनेटर Chris Smith ने इसे “भारतीय ईसाइयों की संपत्ति छीनने वाला कानून” तक कह दिया। Democratic सांसद भी इसका विरोध कर रहे हैं। मई में विदेश मंत्री Marco Rubio कोलकाता में Missionaries of Charity तक गए। जब एक संप्रभु देश का घरेलू कानून किसी विदेशी देश के दोनों प्रमुख दलों को एक साथ परेशान करे, तो समझ लीजिए — वह कानून सही दिशा में जा रहा है।
और अब दूसरा बड़ा मुद्दा — परिसीमन बिल। यह बिल अभी आधिकारिक एजेंडे में नहीं है, लेकिन हर तरफ इसके “सरप्राइज” आने की चर्चा है। इसे पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए और सरकार बजट सत्र के बाद से इसके लिए जमीन तैयार कर रही है। विपक्ष का विरोध यहां भी वही पुराना — उत्तर-दक्षिण विभाजन का राग। लेकिन असली डर कुछ और है।
असम का उदाहरण विपक्ष की नींद उड़ाने के लिए काफी है। 2023 में असम में परिसीमन हुआ। पहले 35 मुस्लिम बहुल सीटें थीं, परिसीमन के बाद घटकर 22 रह गईं — सीधे 13 सीटों की कमी। बराक घाटी में सीटें 15 से 13 हुईं, बारपेटा में 8 से 6। वहीं SC आरक्षित सीटें 8 से 9 और ST आरक्षित सीटें 16 से 19 हो गईं। 2026 के असम चुनाव में नतीजा सबके सामने था — मुस्लिम विधायकों की संख्या 31 से घटकर 22 रह गई। अकेले कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम हैं — यानी उनका पूरा असम अस्तित्व एक समुदाय-विशेष पर टिका है।
राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पूरे देश में करीब 105 मुस्लिम-बहुल लोकसभा सीटें हैं — कुल सीटों का लगभग 19 प्रतिशत। इनमें से 65 सीटों पर 35 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है और 40 सीटों पर करीब 20 प्रतिशत। परिसीमन लागू होने पर इन सभी सीटों के समीकरण बदल सकते हैं। INDIA गठबंधन की चुनावी रणनीति का पूरा ढांचा इन्हीं सीटों के इर्द-गिर्द बुना गया है — पहले मुस्लिम वोट सिक्योर करो, फिर बाकी रणनीति बनाओ। परिसीमन इस पूरे नैरेटिव को ध्वस्त कर सकता है।
यही है असली हंगामे की जड़। FCRA संशोधन विदेशी पैसे की नल बंद करता है जो दशकों से देश-विरोधी गतिविधियों, धर्मांतरण और विकास-विरोधी अभियानों को पोषित करता रहा है। परिसीमन उस वोटबैंक राजनीति के गणित को तोड़ता है जिस पर विपक्ष का पूरा चुनावी अस्तित्व निर्भर है। दोनों मिलकर एक नई भारतीय राजनीति की नींव रखते हैं — जहां राष्ट्रहित सर्वोपरि है, जहां पारदर्शिता अनिवार्य है, और जहां सत्ता का केंद्र किसी एक समुदाय के वोटबैंक पर नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं पर टिका है। भारत बदल रहा है — और यह बदलाव रुकने वाला नहीं।

