यह खेल अब RBI ने पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक कैविएट दाखिल करके साफ कर दिया है कि टाटा संस की स्टॉक एक्सचेंज लिस्टिंग का रास्ता रोकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा।
कहानी की शुरुआत होती है 2022 से, जब RBI ने टाटा संस को अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC-UL) की सूची में शामिल किया और उसे सितंबर 2025 तक स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने का निर्देश दिया। यह कोई मामूली आदेश नहीं था — इसका मतलब था कि देश के सबसे बड़े और सबसे प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट समूह की होल्डिंग कंपनी को पहली बार सार्वजनिक बाजार के सामने खुलकर आना होगा। टाटा संस, जो दशकों से एक बंद किले की तरह संचालित होती रही है, अचानक पारदर्शिता की कसौटी पर खड़ी हो गई।
टाटा संस ने इस दबाव से बचने की पूरी कोशिश की। कंपनी ने अपना सारा कर्ज चुकाने की रणनीति अपनाई, ताकि NBFC-UL की परिभाषा से बाहर निकला जा सके। मार्च 2024 में टाटा संस ने RBI के पास एक औपचारिक आवेदन दाखिल किया, जिसमें कंपनी ने खुद को एक कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में डी-रजिस्टर करने की मांग की। यह एक सोचा-समझा कानूनी दांव था — अगर यह मान लिया जाए कि टाटा संस CIC है और उसके पास पर्याप्त संपत्ति नहीं है, तो लिस्टिंग की बाध्यता खत्म हो जाती।
लेकिन जून 2026 में RBI ने NBFC वर्गीकरण के लिए एक नया सिद्धांत-आधारित ढांचा जारी किया, जिसने टाटा संस की इस रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस नए ढांचे के तहत अपर लेयर NBFC के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति सीमा तय की गई। टाटा संस की कुल संपत्ति 2.01 लाख करोड़ रुपये है — यानी इस सीमा से दोगुनी से भी ज्यादा। डी-रजिस्ट्रेशन के लिए पात्र होने हेतु किसी कंपनी की संपत्ति 1,000 करोड़ रुपये से कम होनी चाहिए, उसका कोई ग्राहक इंटरफेस नहीं होना चाहिए और वह सार्वजनिक धन नहीं रखती हो। टाटा संस इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं करती।
फिर आया 11 सितंबर 2026 का वह निर्णायक पत्र, जिसने सब कुछ बदल दिया। RBI ने टाटा संस के मार्च 2024 के डी-रजिस्ट्रेशन आवेदन को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया। इस अस्वीकृति के साथ ही टाटा संस के लिए तत्काल स्टॉक एक्सचेंज लिस्टिंग अनिवार्य हो गई — कोई रास्ता नहीं, कोई छूट नहीं।
RBI यहीं नहीं रुका। केंद्रीय बैंक ने इसके साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट में एक कैविएट दाखिल की — एक ऐसा कानूनी दस्तावेज जो यह सुनिश्चित करता है कि अगर कोई भी पक्ष इस निर्देश को अदालत में चुनौती दे, तो कोर्ट कोई भी आदेश — यहाँ तक कि स्टे भी — पारित करने से पहले RBI का पक्ष अनिवार्य रूप से सुने। RBI ने टाटा संस को इस कैविएट की जानकारी भी दे दी है। सूत्रों के अनुसार, इस कदम ने टाटा संस के लिए RBI के निर्देश को अदालत में चुनौती देने की गुंजाइश व्यावहारिक रूप से बहुत कम कर दी है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है — टाटा संस के शेयरधारकों के बीच गहरा मतभेद। नोएल टाटा के नेतृत्व वाले टाटा ट्रस्ट्स, जो कंपनी में 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखते हैं, लिस्टिंग के सख्त खिलाफ हैं। दूसरी तरफ, शापूरजी पालोनजी ग्रुप — जो लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा निजी शेयरधारक है — लिस्टिंग का पूरा समर्थन करता है। यह अंदरूनी खींचतान भी इस पूरे मामले को और जटिल बनाती है।
टाटा संस के बोर्ड की बैठक गुरुवार को निर्धारित है और सूत्रों के अनुसार, RBI के आदेश को कोई भी संभावित कानूनी चुनौती इस बैठक के बाद ही सामने आ सकती है। लेकिन बाजार ने तो पहले ही अपना फैसला सुना दिया है — लिस्टिंग की खबर से टाटा केमिकल्स और टाटा इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों के शेयरों में 20 प्रतिशत तक की तेजी आई, क्योंकि निवेशकों को उम्मीद है कि इस लिस्टिंग से इन कंपनियों को सीधा फायदा होगा।
RBI के दो निर्णायक कदम — पहले टाटा संस के आवेदन को खारिज करना और फिर बॉम्बे HC में कैविएट दाखिल करना — यह साफ संकेत देते हैं कि भारत का सबसे शक्तिशाली वित्तीय नियामक इस बार पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है। टाटा संस की लिस्टिंग अब सिर्फ एक कॉर्पोरेट घटना नहीं, बल्कि भारतीय वित्तीय नियमन की ताकत का प्रदर्शन है।

