भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का ताज़ा सर्वे एक स्पष्ट संकेत देता है — आम भारतीय परिवारों के बीच महंगाई को लेकर चिंता बढ़ रही है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में तेजी ने घरेलू बजट पर दबाव बढ़ाया है और लोगों को आने वाले महीनों में भी कीमतें ऊंची रहने की आशंका है।
RBI के सितंबर 2026 के Inflation Expectations Survey of Households के अनुसार, सर्वे के समय परिवारों द्वारा महसूस की जाने वाली औसत महंगाई का मध्य मान बढ़कर 8.4 प्रतिशत हो गया, जबकि पिछले सर्वे में यह 7.8 प्रतिशत था। अगले तीन महीनों के लिए परिवारों की महंगाई अपेक्षा 9.2 प्रतिशत से बढ़कर 9.9 प्रतिशत हो गई, जबकि एक वर्ष आगे की अपेक्षा 9.4 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गई। सर्वे 10 से 20 सितंबर के बीच 19 प्रमुख शहरों में किया गया और इसमें 5,987 लोगों ने हिस्सा लिया।
इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि भारत की वास्तविक उपभोक्ता महंगाई आने वाले वर्ष में 10 प्रतिशत तक पहुंच ही जाएगी। RBI स्वयं स्पष्ट करता है कि यह सर्वे परिवारों की धारणा और अपेक्षाओं को मापता है। लोग अपने रोजमर्रा के खर्च, विशेष रूप से भोजन, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों के आधार पर महंगाई को महसूस करते हैं। इसलिए उनकी धारणा आधिकारिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से काफी अलग हो सकती है।
फिर भी इन अपेक्षाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यदि परिवारों को लगता है कि आने वाले महीनों में कीमतें लगातार बढ़ती रहेंगी, तो उनका आर्थिक व्यवहार भी बदल सकता है। लोग कुछ खरीदारी पहले कर सकते हैं, गैर-जरूरी खर्च कम कर सकते हैं, अधिक वेतन की मांग कर सकते हैं या अपनी बचत की रणनीति बदल सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक महंगाई की वास्तविक दर के साथ-साथ लोगों की महंगाई अपेक्षाओं पर भी नजर रखते हैं।
इस बार चिंता का सबसे बड़ा कारण भोजन और ऊर्जा की बढ़ती लागत है। सितंबर में खाद्य और ऊर्जा कीमतों के दबाव के कारण भारत की उपभोक्ता महंगाई में तेज वृद्धि की आशंका जताई गई है। रॉयटर्स के अर्थशास्त्रियों के सर्वे में सितंबर की खुदरा महंगाई लगभग 5.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया, जो अगस्त के 4.82 प्रतिशत से अधिक होगा। खाद्य और पेय पदार्थ भारतीय CPI बास्केट का बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए इनमें होने वाली वृद्धि का असर परिवारों की महंगाई धारणा पर बहुत तेजी से पड़ता है।
इसका प्रभाव सभी परिवारों पर समान नहीं होता। कम और मध्यम आय वाले परिवार अपनी आय का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा भोजन, परिवहन, ऊर्जा और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करते हैं। ऐसे में इन श्रेणियों में कीमतों की वृद्धि उनकी वास्तविक क्रय शक्ति को तेजी से प्रभावित कर सकती है। आय बढ़ने के बावजूद यदि आवश्यक खर्च उससे तेज गति से बढ़ते हैं, तो परिवारों को अपनी खपत में कटौती करनी पड़ सकती है।
RBI के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि अभी भी मजबूत बनी हुई है, लेकिन यदि महंगाई लगातार ऊंची रहती है तो केंद्रीय बैंक के सामने विकास और मूल्य स्थिरता के बीच संतुलन कठिन हो जाता है। अक्टूबर की मौद्रिक नीति बैठक में RBI ने लगभग चार वर्षों में पहली बार प्रमुख ब्याज दर बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दी, जिससे यह संकेत मिला कि केंद्रीय बैंक बढ़ते मूल्य दबाव को गंभीरता से ले रहा है।
ब्याज दरों में वृद्धि का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मांग और ऋण वृद्धि को कुछ हद तक नियंत्रित करना होता है, ताकि कीमतों पर दबाव कम किया जा सके। लेकिन इसकी अपनी लागत भी होती है। होम लोन, ऑटो लोन और व्यवसायिक ऋण महंगे हो सकते हैं और परिवारों तथा कंपनियों के खर्च पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि RBI को केवल मौजूदा महंगाई के आंकड़े ही नहीं, बल्कि यह भी देखना पड़ता है कि कीमतों को लेकर लोगों की सोच किस दिशा में जा रही है।
इस संदर्भ में ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। RBI के सितंबर उपभोक्ता विश्वास सर्वे में ग्रामीण परिवारों का वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को लेकर भरोसा लगातार छठे दौर में कमजोर हुआ। आर्थिक स्थिति, रोजगार और आय को लेकर लोगों की धारणा में गिरावट दर्ज की गई, जबकि खर्च बढ़ने की अपेक्षा बनी रही। इसका अर्थ यह है कि परिवारों को एक साथ दो तरह के दबाव का सामना करना पड़ सकता है — आय और रोजगार को लेकर अनिश्चितता तथा आवश्यक खर्चों में वृद्धि।
यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण विरोधाभास पैदा करती है। व्यापक स्तर पर देश मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकता है, निवेश बढ़ सकता है और उत्पादन में तेजी बनी रह सकती है, लेकिन यदि घरेलू स्तर पर परिवारों को अपनी वास्तविक आय और क्रय शक्ति कमजोर होती महसूस होती है, तो विकास के लाभ का अनुभव समान रूप से नहीं होता।
यही कारण है कि महंगाई केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है। इसका सीधा संबंध घरेलू विश्वास, उपभोग, बचत और अंततः आर्थिक वृद्धि से है। यदि लोगों को भरोसा हो कि कीमतें नियंत्रण में रहेंगी, तो वे लंबी अवधि के खर्च और निवेश के फैसले अधिक आत्मविश्वास के साथ लेते हैं। इसके विपरीत, लगातार बढ़ती महंगाई अपेक्षाएं अर्थव्यवस्था में सावधानी और अनिश्चितता को बढ़ा सकती हैं।
भारत की आर्थिक वृद्धि की कहानी अभी भी मजबूत है। लेकिन RBI का ताज़ा सर्वे यह याद दिलाता है कि तेज GDP वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। विकास की रफ्तार तभी टिकाऊ होगी जब परिवारों की वास्तविक आय और क्रय शक्ति भी सुरक्षित रहे।
आने वाले महीनों में इसलिए दो संकेतकों पर विशेष नजर रहेगी — वास्तविक खुदरा महंगाई किस दिशा में जाती है और क्या RBI की मौद्रिक नीति परिवारों की बढ़ती महंगाई अपेक्षाओं को फिर नीचे लाने में सफल होती है। यदि खाद्य और ईंधन कीमतों का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो महंगाई केवल केंद्रीय बैंक की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि घरेलू खपत और भारत की व्यापक विकास रणनीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

