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भारत की प्राचीन शक्ति को Global मंच पर: NITI Aayog ने आयुर्वेद और योग के लिए बनाया बड़ा Roadmap

भारत की प्राचीन शक्ति को Global मंच पर: NITI Aayog ने आयुर्वेद और योग के लिए बनाया बड़ा Roadmap

भारत की हजारों साल पुरानी चिकित्सा विरासत अब दुनिया की भाषा बोलने के लिए तैयार दिख रही है। गुरुवार को NITI Aayog ने “आयुर्वेद को वैश्विक बनाने के लिए रणनीतिक रोडमैप” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की, जिसमें ऐसी सिफारिशें प्रस्तुत की गई हैं जो आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक स्वास्थ्य नीति, आर्थिक रणनीति और Soft Power को नई दिशा दे सकती हैं।

रिपोर्ट का उद्देश्य केवल आयुर्वेद के प्रचार तक सीमित नहीं है। इसमें एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसके तहत आयुर्वेद को वैज्ञानिक अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय मानकों, नियामकीय ढांचे, चिकित्सा शिक्षा और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ बेहतर तरीके से जोड़े जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। नीति आयोग का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों में समन्वित प्रयास किए जाएं, तो आयुर्वेद केवल भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली नहीं रहेगा, बल्कि विश्व स्तर पर एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी स्वास्थ्य विकल्प के रूप में स्थापित हो सकता है।

भारत में वर्तमान में 3,55,000 से अधिक प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक कार्यरत हैं, जो दुनिया में सबसे बड़ा आयुर्वेदिक चिकित्सा नेटवर्क बनाते हैं। इसके अलावा हजारों शिक्षण संस्थान, अनुसंधान केंद्र और आयुर्वेदिक अस्पताल इस पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यवस्था में आयुर्वेद को अभी तक वह संस्थागत मान्यता और स्वीकार्यता प्राप्त नहीं हुई है, जिसकी लंबे समय से मांग की जाती रही है।

रिपोर्ट इस अंतर को दूर करने के लिए कई रणनीतिक सुझाव देती है। इनमें वैश्विक स्तर पर मानकीकरण, अनुसंधान आधारित प्रमाणों को मजबूत करना, गुणवत्तापूर्ण आयुर्वेदिक उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना, विदेशी विश्वविद्यालयों और चिकित्सा संस्थानों के साथ सहयोग विकसित करना तथा अंतरराष्ट्रीय नियामकीय प्रक्रियाओं के अनुरूप प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रणाली को सुदृढ़ करना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक प्रमाणों और गुणवत्ता नियंत्रण पर अधिक निवेश आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

आर्थिक दृष्टि से भी इस पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैश्विक wellness industry का आकार लगातार बढ़ रहा है और preventive healthcare, प्राकृतिक उपचार तथा holistic medicine की मांग पहले से कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में wellness tourism, herbal medicines, nutraceuticals, personal care products और international medical education जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए नए अवसर खुल सकते हैं। यदि आयुर्वेद को वैश्विक बाजारों में अधिक व्यवस्थित रूप से स्थापित किया जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर के नए आर्थिक अवसर पैदा कर सकता है और लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार का स्रोत बन सकता है।

यह पहल भारत की सांस्कृतिक कूटनीति से भी गहराई से जुड़ी हुई है। जिस प्रकार योग ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की मान्यता प्राप्त कर वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया, उसी प्रकार सरकार अब आयुर्वेद को भी वैश्विक स्वास्थ्य विमर्श में अधिक प्रमुख स्थान दिलाने की दिशा में काम कर रही है। हाल के वर्षों में पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को लेकर वैश्विक संस्थानों की बढ़ती रुचि ने भी इस प्रयास को नई गति दी है।

यह रोडमैप केवल एक स्वास्थ्य नीति दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत विरासत को आधुनिक अर्थव्यवस्था, नवाचार और वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इसकी सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि वैज्ञानिक अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नियामकीय सुधारों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत आयुर्वेद को घरेलू परंपरा से आगे बढ़ाकर वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है।

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