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DGFT की बड़ी कार्रवाई: 15 प्री-शिपमेंट एजेंसियों की मान्यता रद्द, मेटल स्क्रैप इंडस्ट्री में हलचल

DGFT की बड़ी कार्रवाई: 15 प्री-शिपमेंट एजेंसियों की मान्यता रद्द, मेटल स्क्रैप इंडस्ट्री में हलचल

मुंद्रा बंदरगाह पर एक मेटल रीसाइक्लिंग कंपनी के अधिकारी उस दिन को याद करते हैं जब उन्हें एहसास हुआ कि उनके आठ कार्गो कंटेनर बंदरगाह पर फंसे हुए हैं — न किसी तकनीकी खराबी की वजह से, न किसी तूफान की वजह से, बल्कि इसलिए कि जिस एजेंसी ने उनके माल का निरीक्षण किया था, उसकी सरकारी मान्यता रद्द हो चुकी थी। जुर्माना भरो, दोबारा निरीक्षण करवाओ, और तब जाकर माल छूटे — यही हाल था उस कंपनी का, और यही हाल है आज भारत के द्वितीयक इस्पात उद्योग का।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने हाल ही में 15 प्री-शिपमेंट इंस्पेक्शन एजेंसियों (PSIAs) की मान्यता रद्द कर दी है। यह कार्रवाई कोई अचानक नहीं हुई — एक गहन समीक्षा के बाद यह सामने आया कि इन एजेंसियों ने प्री-शिपमेंट इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट (PSICs) जारी करने में गंभीर अनियमितताएं बरती थीं।

क्या होता है PSIA का काम?

PSIAs वे DGFT-अनुमोदित संस्थाएं हैं जो लोडिंग बंदरगाह पर खेप का निरीक्षण करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि भारत में आने वाला मेटल स्क्रैप रेडियोएक्टिव सामग्री, हथियार, गोला-बारूद या विस्फोटकों से मुक्त हो। यह कोई bureaucratic formality नहीं है — यह राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली रक्षा पंक्ति है। आयातक सीमा शुल्क निकासी के समय यही PSIC सीमा शुल्क विभाग को प्रस्तुत करता है, और उसके बाद ही माल देश में प्रवेश करता है।

DGFT की जांच में पाया गया कि रद्द की गई एजेंसियों ने बिना उचित जांच के एक ही उपकरण से कई देशों में बड़ी संख्या में PSICs जारी किए थे — यानी कागज़ पर निरीक्षण, ज़मीन पर कुछ नहीं। Foreign Trade (Development & Regulation) Act, 1992 के तहत ऐसी गलत घोषणाओं पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, और इसी आधार पर 15 एजेंसियों को डीलिस्ट किया गया।

आयातकों पर पड़ी दोहरी मार

इस कार्रवाई का सबसे तात्कालिक असर उन आयातकों पर पड़ा जिनके माल का निरीक्षण इन्हीं एजेंसियों ने किया था — मान्यता रद्द होने से पहले। एक सूचीबद्ध मेटल रीसाइक्लिंग कंपनी के अधिकारी ने बताया कि कंपनी को मुंद्रा बंदरगाह पर सात कार्गो पर जुर्माना भरना पड़ा और स्थानीय एजेंसियों से दोबारा निरीक्षण करवाना पड़ा, क्योंकि रद्द एजेंसियों द्वारा जारी PSICs सीमा शुल्क निकासी के लिए स्वीकार नहीं किए गए।

अधिकारी के शब्दों में, “जब किसी एजेंसी का लाइसेंस DGFT द्वारा रद्द किया गया, तो DGFT ने कहा कि उनके द्वारा जारी प्रमाणपत्र वैध नहीं है।” यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ आयातक ने नियम के अनुसार काम किया, लेकिन एजेंसी की गड़बड़ी की कीमत उसे चुकानी पड़ी — यह न्यायसंगत नहीं है, और उद्योग जगत इसी बात पर नाराज़ है।

DGFT का पक्ष और राहत के उपाय

DGFT ने उद्योग की चिंताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया। नियामक ने PSIC जारी करने की समयसीमा घटाकर दो दिन कर दी है और व्यापार में निरंतरता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त PSIAs को मान्यता दी है। DGFT का तर्क है कि स्रोत-पक्ष निरीक्षण — यानी माल भेजने वाले देश में ही जांच — राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अपरिहार्य सुरक्षा कवच है।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे निर्दिष्ट सुरक्षित देशों से आने वाले स्क्रैप के लिए, निर्धारित शर्तों के अधीन, आपूर्तिकर्ता या स्क्रैप-यार्ड प्रमाणपत्र को PSIA निरीक्षण के विकल्प के रूप में स्वीकार किया जाता है — यह एक महत्वपूर्ण राहत है जो व्यापार को पूरी तरह ठप होने से बचाती है।

इंडस्ट्री की माँग: अब भारत में हो निरीक्षण

भारत सालाना 1.3 करोड़ टन मेटल स्क्रैप आयात करता है और देश भर के बंदरगाहों पर प्रतिदिन लगभग 2,500 कंटेनर स्क्रैप का संचालन होता है — यह आंकड़ा बताता है कि यह सिर्फ एक नीतिगत विवाद नहीं, बल्कि भारत के इस्पात उद्योग की रीढ़ से जुड़ा सवाल है।

मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MRAI) ने इस संकट को एक अवसर के रूप में देखा है — आयात प्रक्रिया को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने का अवसर। MRAI का तर्क है कि 18 प्रमुख भारतीय समुद्री बंदरगाह पहले से ही उन्नत विकिरण स्कैनिंग तकनीक से लैस हैं, और सत्यापन प्रक्रिया को घरेलू बंदरगाहों पर स्थानांतरित करना विदेशी एजेंसियों पर निर्भर रहने की तुलना में कहीं अधिक विश्वसनीय, कुशल और किफायती होगा। यह सोच एकदम सही दिशा में है — Make in India की भावना के अनुरूप, जहाँ हम अपनी सुरक्षा जांच के लिए भी विदेशी एजेंसियों का मुँह न ताकें।

DGFT ने निरीक्षण क्षमता के विस्तार पर चर्चा करने की इच्छा जताई है, जो एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन मुंद्रा बंदरगाह पर खड़े उस अधिकारी के लिए, जिसने जुर्माना भरकर अपना माल छुड़ाया, असली सवाल यह है कि नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच की यह खाई कब पाटी जाएगी — और क्या भारत अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत के अनुरूप एक ऐसी प्रणाली बना सकता है जो न सुरक्षा से समझौता करे, न व्यापार को थामे?

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