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विपक्ष की CEC ज्ञानेश कुमार गिरफ्तारी की मांग: कानून क्यों कहता है ‘नहीं’?

विपक्ष की CEC ज्ञानेश कुमार गिरफ्तारी की मांग: कानून क्यों कहता है 'नहीं'?

दिसंबर 2023 में जब केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पास किया, तब शायद कम ही लोगों ने सोचा था कि इस कानून की एक धारा इतनी जल्दी राजनीतिक तूफान के केंद्र में आ जाएगी। उस कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने ज्ञानेश कुमार — और आज उन्हीं की गिरफ्तारी की मांग विपक्षी दल कर रहे हैं।

विवाद की जड़ें जून 2025 में बिहार से शुरू हुई उस मतदाता सूची सफाई प्रक्रिया में हैं, जिसे Special Intensive Revision (SIR) कहा जाता है। इस अभियान के तहत अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम मसौदा मतदाता सूचियों से हटाए जा चुके हैं — एक संख्या जिसने पूरे देश में सियासी बहस को आग लगा दी।

इसी बीच एक प्रमुख अखबार की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि चुनाव आयोग के तीन में से दो आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। यह रिपोर्ट आते ही विपक्ष ने CEC ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा और मनमाने निर्णय लेने का आरोप मढ़ दिया और मामला सड़क से संसद तक पहुंच गया।

इसी पृष्ठभूमि में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने दिल्ली के संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचकर CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। उन पर प्रक्रियागत उल्लंघन, एकतरफा निर्णय लेने और मतदाता सूचियों में हेरफेर के गंभीर आरोप लगाए गए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी खुलकर ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों के खिलाफ “कड़ी कार्रवाई” की धमकी दी, इसे सीधे “वोट चोरी” का षड्यंत्र करार दिया।

लेकिन यहीं पर कानून विपक्ष की राह रोकता है — और बहुत मजबूती से। 2023 के चुनाव आयुक्त कानून की धारा 16 साफ शब्दों में कहती है कि कोई भी न्यायालय CEC या किसी चुनाव आयुक्त के विरुद्ध — चाहे वे सेवारत हों या पूर्व — उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए किसी भी कार्य, बात या निर्णय के लिए कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं कर सकता। यह संरक्षण व्यापक है, स्पष्ट है और इसे लेकर कानून में कोई अस्पष्टता नहीं छोड़ी गई।

महुआ मोइत्रा ने इस कानूनी ढाल को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह छूट तभी लागू होती है जब आयोग एक सामूहिक निकाय के रूप में कार्य करे — और चूंकि रिपोर्ट से साबित होता है कि निर्णय बहुमत से नहीं, बल्कि एकतरफा लिए जा रहे थे, इसलिए यह सुरक्षा कवच हटनी चाहिए। यह तर्क राजनीतिक रूप से धारदार जरूर है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं दिखते। उनका कहना है कि धारा 16 का दायरा इतना व्यापक है कि वह आधिकारिक कार्यों से जुड़ी किसी भी कार्यवाही को — चाहे वह एकतरफा हो या सामूहिक — प्रभावी रूप से रोकती है। हालांकि, कानून में गिरफ्तारी का स्पष्ट उल्लेख न होने से जांच कार्रवाई पर इस प्रावधान के प्रभाव की व्याख्या कानूनी दृष्टि से अभी भी खुली है।

इस कानूनी संरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी जा चुकी है, जहां इसके व्यापक दायरे पर सवाल उठाए गए हैं — लेकिन अभी तक इसे पलटा नहीं गया है। विपक्ष के पास एक और रास्ता बचता है और वह है महाभियोग — जिसके लिए संसद के दोनों सदनों के 193 सदस्यों ने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। CEC को हटाने का यही एकमात्र संवैधानिक मार्ग है, और इसके लिए संसद में बहुमत की जरूरत होगी — जो फिलहाल विपक्ष के पास नहीं है।

चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि पिछले एक साल में उसके सभी निर्णय “सर्वसम्मति” से लिए गए और अंदरूनी मतभेद उसकी विचार-विमर्श प्रक्रिया का एक सामान्य और स्वस्थ हिस्सा हैं। यह पूरा विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है — क्या भारत की चुनावी संस्थाओं की साख और स्वायत्तता पर बढ़ता राजनीतिक दबाव लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? यह बहस अभी खत्म नहीं हुई, बल्कि अभी-अभी शुरू हुई है।

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