हिंद महासागर की रणनीतिक धुरी पर एक बड़ा उलटफेर हुआ है। चीन की सरकारी दिग्गज कंपनी चाइना मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स (CMPort) ने श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट पर प्रस्तावित 392 मिलियन डॉलर के साउथ एशिया कमर्शियल एंड लॉजिस्टिक्स हब (SACLH) प्रोजेक्ट से अपना हाथ खींच लिया है। 15 अक्टूबर 2026 को हांगकांग स्टॉक एक्सचेंज में दाखिल आधिकारिक सूचना में इस प्रोजेक्ट के औपचारिक समापन की पुष्टि की गई। इसके बाद श्रीलंका पोर्ट्स अथॉरिटी (SLPA) ने 30 दिनों के भीतर प्रोजेक्ट कंपनी को 21.905 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का समझौता किया है।
यह प्रोजेक्ट दक्षिण एशिया के सबसे महत्वाकांक्षी लॉजिस्टिक्स परिसरों में से एक बनने की संभावना रखता था। इसे 50 साल के बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) समझौते के तहत विकसित किया जाना था, जिसमें CMPort की सहायक कंपनी फॉर्च्यून सेंटर ग्रुप लिमिटेड की 70 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। SLPA और श्रीलंका की एक्सेस इंजीनियरिंग PLC प्रत्येक के पास 15-15 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। तीनों साझेदारों ने मिलकर इस परियोजना में कुल 37.14 मिलियन डॉलर लगाए थे, जिनमें से चीनी कंपनी की सहायक इकाई का योगदान अकेले 26 मिलियन डॉलर था।
श्रीलंका सरकार ने दिसंबर 2023 में इस प्रोजेक्ट को स्ट्रैटेजिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का दर्जा देते हुए 15 साल तक कॉरपोरेट इनकम और डिविडेंड टैक्स से छूट सहित कई बड़ी रियायतें दी थीं। इतनी सुविधाओं के बावजूद प्रोजेक्ट तय रोडमैप पर नहीं चल सका। बदलती परिस्थितियों, ऑपरेशनल माहौल में उथल-पुथल और व्यावसायिक कारणों को इसके रद्द होने की वजह बताया गया है, हालांकि असली रणनीतिक कारण कहीं अधिक गहरे हैं।
रणनीतिक मामलों के प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने इस घटनाक्रम को चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के लिए एक “रेयर रिट्रीट” यानी दुर्लभ वापसी करार दिया है। उनके अनुसार, CMPort का यह कदम चीन की ओर से प्रोजेक्ट के जोखिमों का नए सिरे से आकलन और रणनीतिक पुनर्संतुलन का संकेत देता है। गौरतलब है कि CMPort के पास पहले से ही श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट का 99 साल का लीज अधिकार है और वह कोलंबो पोर्ट पर CICT टर्मिनल भी ऑपरेट करती है, यानी इंडो-पैसिफिक में चीन की मौजूदगी पहले से ही मजबूत है।
अब असली सवाल यह है कि इस खाली हुई जगह को कौन भरेगा — और यहीं से भारत की कहानी शुरू होती है। चेलानी का स्पष्ट मत है कि इस रद्दीकरण से भारत और जापान के लिए एक ऐतिहासिक अवसर खुलता है। दोनों देश पहले से कोलंबो पोर्ट पर वेस्ट कंटेनर टर्मिनल (WCT) के संयुक्त विकास में साझेदार हैं। SACLH प्रोजेक्ट के खत्म होने से पोर्ट पर वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में किसी एक दबदबे वाली चीनी कंपनी से सीधी प्रतिस्पर्धा का दबाव अब काफी हद तक कम हो जाता है। यह वही strategic space है जिसे भारत लंबे समय से हिंद महासागर में तलाश रहा था।
प्रोजेक्ट रद्द होने के बाद SLPA को 21.905 मिलियन डॉलर का तत्काल भुगतान करना होगा, और प्रोजेक्ट कंपनी के पास मौजूद करीब 7.85 मिलियन डॉलर की अवशिष्ट नकदी को शेयरधारकों में उनकी हिस्सेदारी के अनुपात में बांटा जाएगा। यह तात्कालिक वित्तीय बोझ जरूर है, लेकिन इसके बदले में श्रीलंका को अपने पोर्ट की बेशकीमती जमीन वापस मिलती है और एक बड़े एक्सक्लूसिविटी अरेंजमेंट से मुक्ति भी।
अब श्रीलंका के पास यह मौका है कि वह नई शर्तों पर टेंडर जारी करे — ऐसी शर्तें जो उसकी बदलती आर्थिक जरूरतों और विदेश नीति की प्राथमिकताओं के अनुकूल हों। अगर भारत या जापान की कंपनियां इस प्रक्रिया में शामिल होती हैं, तो कोलंबो पोर्ट पर भारतीय लॉजिस्टिक्स की मौजूदगी एक नए स्तर पर पहुंच सकती है। फिलहाल किसी भी पक्ष से आधिकारिक निवेश की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन geopolitical momentum साफ दिख रहा है — और Bharat इसे गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकता।

