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BJP को बड़ा झटका: पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का इस्तीफा और सपा की ओर रुख — बरेली की सियासत में भूचाल

BJP को बड़ा झटका: पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का इस्तीफा और सपा की ओर रुख — बरेली की सियासत में भूचाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हुआ है। आंवला लोकसभा सीट के पूर्व भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप ने पार्टी की प्राथमिक और सक्रिय सदस्यता से औपचारिक इस्तीफा दे दिया है, और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से बातचीत होने का दावा किया है। यह महज एक नेता का पाला बदलना नहीं है — यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बरेली की सियासत में एक निर्णायक हलचल है, जो BJP के OBC समीकरण को सीधी चुनौती देती है।

धर्मेंद्र कश्यप का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। BSP से शुरुआत, 2002 में बिथरी चैनपुर से पहली जीत, फिर SP में आए और 2007 में जीते, उसके बाद BJP का दामन थामा और 2014 व 2019 में आंवला से लगातार दो बार लोकसभा पहुंचे। लेकिन 2024 में SP के नीरज मौर्य ने उन्हें 15,969 वोटों के अंतर से हरा दिया। हार के बाद वे राज्यसभा में जगह तलाश रहे थे — पर वहाँ भी BJP ने उनका नाम लिस्ट से बाहर रखा।

इसी बेइज्जती का जवाब उन्होंने सोशल मीडिया पर “टाटा बाय-बाय” लिखकर दिया। सार्वजनिक रूप से उन्होंने आरोप लगाया कि BJP में पिछड़े और अति पिछड़े समाज को अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता। उनका कहना है कि जो लोग कभी चुनाव नहीं लड़े, उन्हें अग्रिम पंक्ति में बैठाया जाता है — और जो जनता के बीच जाकर लड़े, जीते, उन्हें हाशिये पर धकेला जाता है। यह गुस्सा असली है। यह सिर्फ कश्यप का नहीं, बल्कि BJP के भीतर दबे हुए OBC नेताओं के एक बड़े वर्ग का दर्द है।

कश्यप ने अब 2027 विधानसभा चुनाव में अपनी बेटी कीर्ति कश्यप को बिथरी चैनपुर सीट से SP के टिकट पर उतारने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा — “मेरी बेटी समाजवादी पार्टी की सदस्यता लेगी और विधायक बनेगी, मैं उनकी पूरी मदद करूंगा।” यह सीट कश्यप की पुरानी जमीन है, जहाँ से उन्होंने खुद 2002 में पहली बार जीत दर्ज की थी। वहाँ उनकी पकड़ आज भी मजबूत मानी जाती है।

BJP ने उन्हें मनाने की कोशिश की — कश्यप खुद बताते हैं कि इस्तीफे के बाद कई बड़े नेता दरवाजे पर आए। पर उन्होंने साफ कह दिया: “अब बातचीत से क्या होगा?” जब राज्यसभा की सूची बनी और नाम नहीं आया, तब कहाँ थे ये नेता? यह सवाल BJP के लिए असुविधाजनक है, खासकर तब जब 2027 में OBC वोट बैंक को साधना उसकी सबसे बड़ी चुनौती होगी।

असली सवाल यह है कि क्या धर्मेंद्र कश्यप का यह कदम BJP के लिए सिर्फ एक सांगठनिक नुकसान है, या यह उस बड़े दरार का संकेत है जो पार्टी के भीतर OBC प्रतिनिधित्व को लेकर गहरी होती जा रही है? बरेली की जमीन पर कश्यप की जड़ें हैं, उनका जनाधार है, और अब उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं। SP के लिए यह एक बड़ा अवसर है — और BJP के लिए, 2027 से पहले एक चेतावनी।

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