बात सीधी है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने NALSAR हैदराबाद के 2026 बैच के सैकड़ों law graduates का enrollment रोक दिया — सिर्फ इसलिए कि कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को आमंत्रित करने के खिलाफ अभियान चलाया था। यह निर्णय बाद में वापस लिया गया, लेकिन असली सवाल अभी भी हवा में तैर रहा है — क्या किसी भी संस्था को यह अधिकार है कि वह असहमति की सजा पूरे बैच को दे?
थीसिस एकदम clear है: सामूहिक दंड न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि यह उस कानूनी व्यवस्था की बुनियाद को ही कमजोर करता है जिसकी रक्षा के लिए BCI खुद बनी है। यह विवाद एक isolated घटना नहीं — यह एक systemic warning है।
पहला तथ्य देखिए। BCI ने सभी राज्य Bar Councils को निर्देश दिया था कि वे अगले आदेश तक NALSAR 2026 बैच का enrollment न करें। इसका मतलब था कि जिन छात्रों ने 5 साल पढ़ाई की, exams दिए, degree हासिल की — वे कानूनी पेशे में प्रवेश ही नहीं कर सकते थे। उनकी “गलती”? वे उस बैच में थे जहाँ कुछ छात्रों ने protest किया।
यह प्राकृतिक न्याय के सबसे बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति का अधिकार देता है — law student हो या कोई और। जब BCI जैसी संस्था इस अधिकार के इस्तेमाल पर career-ending consequences attach करती है, तो वह एक chilling effect पैदा करती है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरनाक है।
Collective Punishment: कानून का सबसे बड़ा विरोधाभास
जो बात इस मामले को और भी ironic बनाती है वह यह है कि BCI खुद एक कानूनी संस्था है। और कानून का सबसे पुराना, सबसे स्थापित सिद्धांत यही है — सजा सिर्फ उसी को मिलनी चाहिए जिसने नियम तोड़ा हो। किसी और के कृत्य की सजा निर्दोषों को देना न केवल अनैतिक है, यह legally indefensible भी है।
NALSAR 2026 बैच के अधिकांश छात्रों का उस protest से कोई संबंध नहीं था। उनका enrollment रोकना उनके अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत आजीविका के मौलिक अधिकार पर सीधी चोट थी। यह वह अधिकार है जिसे Supreme Court ने बार-बार fundamental माना है — किसी bureaucratic order से ऊपर।
Senior Advocates, Bar के learned members और public-spirited citizens की representations के बाद BCI ने माना कि 2026 बैच का किसी disturbance में कोई role नहीं था। यह U-turn राहत देता है, लेकिन यह सवाल नहीं मिटाता — यह order पहले क्यों आया? किस आधार पर?
भारत एक rising power है, एक Vishwaguru बनने की राह पर। हमारे law schools से निकले graduates इस देश की judiciary, policy और governance को shape करेंगे। इन्हीं युवाओं को अगर यह message मिले कि असहमति जताने की कीमत career है — तो हम किस तरह का legal ecosystem बना रहे हैं? एक मजबूत, आत्मविश्वासी भारत को ऐसी institutions चाहिए जो dissent से डरें नहीं, बल्कि उसे due process से handle करें। यही असली संवैधानिक maturity है।

