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‘सेव डेमोक्रेसी’ बनाम BJP की ‘हैट्रिक’: ज्ञानेश कुमार विवाद में एक दिन में तीन मोर्चे खुले

'सेव डेमोक्रेसी' बनाम BJP की 'हैट्रिक': ज्ञानेश कुमार विवाद में एक दिन में तीन मोर्चे खुले

जब संसद से सड़क तक उतरा विपक्ष

6 अक्टूबर को नई दिल्ली की राजनीतिक धड़कन असामान्य रूप से तेज थी — एक तरफ 19 विपक्षी दलों का ‘सेव डेमोक्रेसी’ मार्च नई संसद से चुनाव आयोग के कार्यालय तक पहुँचा, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने मात्र छह घंटों के भीतर तीन अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर विपक्ष के हर आरोप का जवाब देने की कोशिश की। यह टकराव सिर्फ एक नाम — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार — के इर्द-गिर्द केंद्रित था, जिनके इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA ब्लॉक सड़कों पर उतर आया। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों का यह मार्च देश की लोकतांत्रिक बहस में एक नया अध्याय जोड़ता है, जिसे नजरअंदाज करना किसी के लिए भी मुश्किल होगा।

विपक्ष के आरोप: मतदाता सूची से लेकर फॉर्म-6 तक

INDIA ब्लॉक के नेताओं ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और वोटों को हटाने के गंभीर आरोप लगाए, जो सीधे लोकतंत्र की जड़ों को चुनौती देते हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे मुख्य चुनाव आयुक्त से सीधे सवाल पूछना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मिलने से रोका जा रहा है — यह आरोप अपने आप में बेहद गंभीर है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बिना लाग-लपेट के कहा कि ज्ञानेश कुमार “भाजपा का एजेंट था, है और रहेगा,” और जब तक बैलेट पेपर वापस नहीं आता, चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा संभव नहीं है। विरोध प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलिस ने कुछ समय के लिए हिरासत में लिया और बाद में रिहा किया, जबकि कई अन्य सांसदों को बसों में बिठाकर ले जाया गया — यह दृश्य राष्ट्रीय मीडिया में छा गया।

सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: विवाद को मिली कानूनी धार

इस पूरे विवाद को एक नई और निर्णायक दिशा तब मिली जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और स्पष्ट पूछा कि फॉर्म-6 में बदलाव किसने और किस अधिकार के तहत किया, जबकि शीर्ष अदालत ने किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी थी। यह प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं है — यह संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और जवाबदेही का प्रश्न है, जिसे विपक्ष ने अपने आंदोलन का केंद्रीय हथियार बनाया। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी विपक्ष के हाथ में एक ऐसा तर्क है जिसे BJP भी आसानी से खारिज नहीं कर सकती।

BJP की ‘हैट्रिक’: छह घंटे में तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस

भाजपा ने इस राजनीतिक दबाव का जवाब अपने तरीके से दिया — संबित पात्रा, सुधांशु त्रिवेदी और प्रदीप भंडारी जैसे दिग्गज प्रवक्ताओं को एक के बाद एक मैदान में उतारकर। सुधांशु त्रिवेदी ने सीधे राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव नतीजे इसलिए कांग्रेस के खिलाफ आते रहे हैं क्योंकि उन्होंने कभी मेहनत नहीं की — यह व्यक्तिगत हमला था, संस्थागत बचाव नहीं। भाजपा नेता अशोक वाजपेयी ने विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद में चर्चा छोड़कर सड़कों पर उतरना लोकतंत्र की परंपरा के विरुद्ध है — हालांकि यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है जब सुप्रीम कोर्ट खुद चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा हो। BJP की यह ‘हैट्रिक’ रणनीतिक थी — मीडिया साइकिल को नियंत्रित करने की कोशिश, ताकि विपक्ष का नैरेटिव हावी न हो सके।

असली सवाल: संस्था की साख दांव पर

इस पूरे राजनीतिक घमासान के केंद्र में एक बुनियादी सवाल है — क्या भारत का चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक स्वायत्तता की रक्षा कर पा रहा है, या यह राजनीतिक दबावों के बीच पिस रहा है? एक तरफ विपक्ष की वह चिंता है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता से लिया है, तो दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल का वह बचाव है जो आक्रामक तो है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से अभी अधूरा है। भारत जैसे महान लोकतंत्र की ताकत उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता में है — और वह विश्वसनीयता प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही से बनती है। यह बहस अभी खत्म नहीं हुई है; सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश और चुनाव आयोग के जवाब पर पूरे देश की नजर टिकी है।

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