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विजयादशमी पर भागवत का आह्वान: विरोध प्रदर्शन एकता तोड़ने का हथियार न बने

विजयादशमी पर भागवत का आह्वान: विरोध प्रदर्शन एकता तोड़ने का हथियार न बने

नागपुर की धरती पर इस विजयादशमी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक ऐसा संबोधन दिया जो सिर्फ एक भाषण नहीं, बल्कि आज के भारत की सामाजिक नब्ज़ पर एक गहरी और ज़रूरी चोट है। विजयादशमी — असत्य पर सत्य की, अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व — इससे बेहतर कोई अवसर नहीं हो सकता था यह याद दिलाने के लिए कि भारत की असली शक्ति उसकी एकता में है, उसके बंटवारे में नहीं।

भागवत ने अपने संबोधन में सीधे और बेबाक शब्दों में कहा कि किसी समस्या या शिकायत के इर्द-गिर्द विरोध प्रदर्शन के ज़रिए लोगों को एकजुट करना संभव है — यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा भी है। लेकिन असली सवाल यह है कि जब यही प्रदर्शन समाज में फूट डालने का ज़रिया बन जाएं, तब क्या होगा? जब आंदोलन समस्याओं को सुलझाने की जगह नफरत और कड़वाहट की खेती करने लगे, तब वह लोकतंत्र की ताकत नहीं, उसकी कमज़ोरी बन जाता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह ज़िम्मेदारी सिर्फ आंदोलनकारियों की नहीं है — सरकार, प्रशासन और राजनीतिक नेताओं की भी उतनी ही जवाबदेही है कि कोई भी विरोध प्रदर्शन समाज में दरार न पैदा करे। संविधान और कानून ने हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी दी है, लेकिन इस आज़ादी की भी एक सभ्य सीमा है — और उस सीमा का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है।

भागवत ने पश्चिमी देशों के हालात का हवाला देते हुए एक बड़ी और महत्वपूर्ण चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि भारत को कमज़ोर करने की कोशिश करने वाली बाहरी ताकतें देश के भीतर अस्थिरता पैदा करने के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। “रिजीम चेंज” जैसी अवधारणाओं का ज़िक्र करते हुए उन्होंने चेताया कि भारत के भीतर मौजूद कुछ ताकतें इन आपसी मतभेदों का फायदा उठा सकती हैं। सामाजिक कलह और नफरत उन लोगों के एजेंडे को पूरा करती है जो नहीं चाहते कि भारत एक सशक्त, एकजुट राष्ट्र के रूप में उभरे।

यह कोई काल्पनिक खतरा नहीं है। भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, एक उभरती हुई टेक और मैन्युफैक्चरिंग महाशक्ति है, और इसका demographic dividend दुनिया भर की नज़रों में है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि कुछ ताकतें नहीं चाहतीं कि यह उभान जारी रहे। भागवत का संदेश इसी संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाता है।

सबसे तीखी और सटीक बात भागवत ने तब कही जब उन्होंने राजनीतिक नेताओं को सीधे आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि वोट का लालच, सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक फायदे हमारे विवेक और सद्भावना पर हावी नहीं होने चाहिए। चुनावी नफा-नुकसान की गणना यह तय नहीं करनी चाहिए कि हम सामाजिक समस्याओं पर कैसी प्रतिक्रिया दें। यह बात उन तमाम नेताओं के लिए एक सीधी चुनौती है जो हर आंदोलन को अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का अवसर मान लेते हैं।

भागवत ने यह भी रेखांकित किया कि जब कोई आंदोलन किसी छुपे हुए उद्देश्य से प्रेरित होता है, तो वह राजनीति का एक हथियार बन जाता है — और ऐसे हथियार किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं। प्रदर्शनकारियों और सत्ता में बैठे दोनों पक्षों से उन्होंने यही अपील की कि किसी भी कदम से समाज में मनमुटाव, नफरत, कड़वाहट या बंटवारा पैदा न हो।

विजयादशमी पर मोहन भागवत का यह संदेश एक सांगठनिक भाषण से कहीं आगे जाता है — यह एक सभ्यतागत चेतावनी है। भारत हज़ारों साल की विविधता में एकता की परंपरा का वाहक है, और इस परंपरा को किसी भी राजनीतिक या बाहरी एजेंडे की भेंट नहीं चढ़ने दिया जा सकता। एकजुट भारत ही शक्तिशाली भारत है — और यही संदेश आज हर युवा भारतीय को अपने दिल में बसाना होगा।

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