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रस्सी जली, बल नहीं गया: चुनावी हार के बावजूद INDI गठबंधन में क्षेत्रीय दलों का दबदबा क्यों बरकरार है?

रस्सी जली, बल नहीं गया: चुनावी हार के बावजूद INDI गठबंधन में क्षेत्रीय दलों का दबदबा क्यों बरकरार है?

हार के बाद भी INDI गठबंधन में क्षेत्रीय दलों की पकड़ मजबूत

नई दिल्ली: AAP दिल्ली में सत्ता से बाहर, TMC पश्चिम बंगाल में धराशायी, RJD बिहार में फिसड्डी और DMK तमिलनाडु में पस्त — एक के बाद एक झटके खाने के बावजूद INDI गठबंधन में क्षेत्रीय दलों का दबदबा खत्म नहीं हुआ है। सवाल यह है कि आखिर क्यों? रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया — यह मुहावरा आज की विपक्षी राजनीति पर एकदम सटीक बैठता है।

एक के बाद एक झटके — फिर भी गठबंधन जिंदा

हाल के विधानसभा चुनावों में INDI गठबंधन के घटक दलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। दिल्ली में AAP की सत्ता गई, केरल में वामदलों का सफाया हुआ, बिहार में RJD जीत नहीं पाई, तमिलनाडु में DMK को हार मिली और पश्चिम बंगाल में TMC का 15 साल पुराना किला ढह गया।

इन हारों के बाद कांग्रेस नेताओं को लगने लगा था कि गठबंधन में अब उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कह रही है।

कांग्रेस और क्षेत्रीय दल — दशकों पुरानी खींचतान

INDI गठबंधन की नींव 2024 में BJP को सत्ता से बाहर करने के लिए रखी गई थी। लेकिन इस गठबंधन में शुरू से ही नेतृत्व को लेकर विवाद रहा है। कांग्रेस को उन्हीं दलों के साथ हाथ मिलाना पड़ा, जिन्होंने कभी उसका राजनीतिक आधार तोड़ा था।

दशकों पुरानी यह प्रतिद्वंद्विता कार्यकर्ताओं को दिल से एक नहीं होने देती — यही इस गठबंधन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है।

ओडिशा का सबक: क्षेत्रीय दल कमजोर हुए, फायदा BJP को मिला

ओडिशा में BJD के कमजोर होने पर कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिला। उसकी जगह BJP ने भर दी। यही pattern कई राज्यों में दोहराया गया है। इससे एक बात साबित हो गई — क्षेत्रीय दलों की हार का मतलब कांग्रेस की जीत नहीं है।

इसीलिए पश्चिम बंगाल में TMC की हार के बाद राहुल गांधी ने कहा कि यह किसी एक पार्टी की हार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के लिए चुनौती है। ममता बनर्जी ने भी हार के बाद INDI गठबंधन को और मजबूत करने की बात कही।

2024 का सबक: एकता ने BJP को बहुमत से रोका

2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता ने BJP को अकेले बहुमत हासिल करने से रोका — यह एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन उसके बाद नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा फिर से उभर आई।

अब जब कांग्रेस और क्षेत्रीय दल दोनों राजनीतिक रूप से कमजोर हुए हैं, तो उनके बीच सहयोग की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। साझा दुश्मन BJP — यही वह धागा है जो इस गठबंधन को जोड़े रखता है।

जमीनी पकड़ अभी भी बरकरार — इसीलिए दबदबा कायम

क्षेतत्रीय दल भले ही राज्यों की सत्ता से बाहर हो गए हों, लेकिन उनकी जमीनी पकड़, सामाजिक आधार और स्थानीय प्रभाव अभी भी बरकरार है। यही उन्हें विपक्षी राजनीति का अनिवार्य हिस्सा बनाए रखता है।

सीधे शब्दों में कहें — रस्सी जरूर जली है, लेकिन बल अभी बाकी है। INDI गठबंधन की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका कम हुई है, कमजोर नहीं। आने वाले चुनावों में उनकी भूमिका निर्णायक बनी रहेगी।

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