जंतर-मंतर से सुप्रीम कोर्ट तक
20 जुलाई की वो दोपहर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बेहद तनावपूर्ण थी। प्रदर्शनकारियों की भीड़ में एक 19 साल का नौजवान खड़ा था — और अचानक एक पैलेट उसकी आंख में जा लगी। Rapid Action Force (RAF) द्वारा कथित तौर पर चलाई गई पैलेट गन ने उस दिन दो लोगों को घायल किया। यह घटना सिर्फ एक चोट नहीं थी — यह एक संवैधानिक सवाल बन गई।
और उस सवाल को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने का काम किया एक रिटायर्ड IPS अफसर ने — यशोवर्धन आजाद ने।
कौन हैं यशोवर्धन आजाद?
यशोवर्धन आजाद कोई आम नाम नहीं है। भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में दशकों तक काम करने के बाद वे देश की सबसे संवेदनशील खुफिया एजेंसी — Intelligence Bureau (IB) — में Special Director के पद तक पहुंचे। यह पद सिर्फ काबिलियत से नहीं, बल्कि असाधारण विश्वसनीयता से हासिल होता है।
रिटायरमेंट के बाद भी आजाद चुप नहीं बैठे। Public policy, नागरिक अधिकार और पुलिस सुधार — इन मुद्दों पर वे लगातार सक्रिय रहे हैं। वे उस सोच के पक्षधर हैं जिसमें पुलिस जवाबदेह हो, कानून का राज हो, और मानवाधिकारों की रक्षा हो। यही सोच उन्हें जंतर-मंतर की उस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक खींच लाई।
याचिका में क्या मांगा गया?
आजाद ने दो घायल प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। मांग सीधी और स्पष्ट थी — नागरिक प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए metallic pellet projectile weapons के इस्तेमाल पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगाया जाए।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इन हथियारों को “Less Lethal” कहना भ्रामक है। नज़दीक से दागे जाने पर ये आंख, सिर और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। उस 19 वर्षीय युवक की आंख की चोट इसी खतरनाक सच्चाई का जीता-जागता सबूत थी।
याचिका में संयुक्त राष्ट्र (UN) के “Less Lethal Weapons in Law Enforcement Guidelines” का भी हवाला दिया गया। UN के दिशानिर्देश भी भीड़ नियंत्रण में metallic pellet guns के इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ऐसे हथियारों का प्रयोग Necessity, Proportionality और Reasonableness की संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
CJI सूर्याकांत की बेंच ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने अदालत का रुख स्पष्ट किया — सिर्फ पैलेट गन पर प्रतिबंध की मांग करना पर्याप्त नहीं है।
जस्टिस बागची ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता पैलेट गन का उपयोग पूरी तरह बंद करवाना चाहते हैं, तो उन्हें उन कानूनी प्रावधानों को चुनौती देनी होगी जो “Graded Response” यानी चरणबद्ध बल प्रयोग के तहत पुलिस को इन हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति देते हैं। पहले यह साबित करना होगा कि वे प्रावधान अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार — का उल्लंघन करते हैं।
अदालत ने यह भी माना कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के पास बल प्रयोग के कई स्तरीय विकल्प होने चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कभी-कभी हिंसक रूप ले सकता है। असामाजिक तत्व भीड़ को हाईजैक कर सकते हैं। लेकिन — और यह महत्वपूर्ण है — अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी विशेष घटना में पैलेट गन के दुरुपयोग की न्यायिक जांच हो सकती है।
केंद्र सरकार और RAF को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और RAF के पुलिस महानिरीक्षक को नोटिस जारी किया। साथ ही एक अहम निर्देश दिया — जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान RAF द्वारा इस्तेमाल किए गए ammunition का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य में उसकी जांच संभव हो सके।
यह निर्देश छोटा लग सकता है। लेकिन इसका अर्थ बड़ा है — अदालत इस मामले को गंभीरता से ले रही है।
असली सवाल: राज्य की ताकत और नागरिक का अधिकार
यह मामला सिर्फ पैलेट गन का नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल का है जो हर लोकतंत्र में उठता है — राज्य की शक्ति कहाँ खत्म होती है और नागरिक का अधिकार कहाँ शुरू होता है?
भारत एक rising power है। हम दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतंत्र हैं। और इसी लोकतंत्र की असली ताकत यह है कि एक रिटायर्ड IPS अफसर — जिसने खुद इस सिस्टम का हिस्सा रहकर देश की सेवा की — उसी सिस्टम को जवाबदेह बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है।
वो 19 साल का लड़का, जिसकी आंख में पैलेट लगी — वो इस देश का भविष्य है। उसकी आवाज़ अब सर्वोच्च न्यायालय में गूंज रही है। अगली सुनवाई तय करेगी कि भारत का कानून उसके साथ खड़ा है या नहीं।

