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मानव तस्करी: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्देश और भारत की लड़ाई एक गंभीर संगठित अपराध के खिलाफ

मानव तस्करी: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्देश और भारत की लड़ाई एक गंभीर संगठित अपराध के खिलाफ

यह सिर्फ एक अपराध नहीं — यह एक संगठित दानव है। भारत में हर दिन युवतियां मानव तस्करों के जाल में फंसती हैं, और दशकों तक कानून उनके साथ पीड़ित की नहीं, बल्कि अपराधी की तरह पेश आता रहा।

कहानी शुरू होती है 1956 से, जब भारत ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम पारित किया। यह कानून संयुक्त राष्ट्र के 1949 के अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन पर आधारित था, जिसका मूल उद्देश्य यौन शोषण को रोकना था। लेकिन इस कानून में एक बड़ी खामी थी — इसमें मानव तस्करी की कोई स्पष्ट परिभाषा ही नहीं थी। दशकों तक यही खामी पीड़ितों के लिए न्याय की राह में दीवार बनती रही।

कानून की खामियां और जस्टिस वर्मा कमेटी का हस्तक्षेप

वर्षों बाद, 2013 में जस्टिस वर्मा कमेटी की अनुशंसाओं के बाद भारतीय दंड विधान में धारा 370 और धारा 370-A IPC जोड़ी गईं। ये प्रावधान अंतरराष्ट्रीय पालेरमो प्रोटोकाल के अनुरूप थे और पहली बार मानव तस्करी को एक गंभीर संगठित अपराध के रूप में परिभाषित किया गया। इससे पहले, 1956 के कानून में दो बार संशोधन हो चुके थे, लेकिन बुनियादी कमियां जस्-की-तस् बनी रहीं। नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत भी मानव तस्करी को संगठित अपराध माना गया है, और बालकों की तस्करी के मामले POCSO तथा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत निपटाए जाते हैं।

इसी दौरान गृह मंत्रालय के निर्देश पर जिलों में मानव तस्करी विरोधी इकाइयां (AHTUs) सक्रिय हुईं, जिन्हें केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता मिली। लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि ये इकाइयां थाने का दर्जा न होने के कारण अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही थीं।

प्रज्वला की याचिका और सुप्रीम कोर्ट का जागना

2004 में मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली संस्था प्रज्वला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। केंद्र सरकार ने कार्रवाई का वादा किया और कोर्ट ने मामला निपटा दिया। लेकिन बुनियादी कमियां बरकरार रहीं। फिर 2022 में प्रज्वला ने दोबारा दस्तक दी। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ सुना, बल्कि ऐतिहासिक निर्देश जारी किए जो पूरे सिस्टम को हिला देने वाले थे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेश्यावृत्ति के लिए तस्करी की शिकार महिला को बचाने के बाद उसके साथ अपराधी जैसा व्यवहार नहीं किया जाएगा। उसकी निजता की रक्षा होगी, मीडिया के सामने उसे पेश नहीं किया जाएगा, और पूछताछ के दौरान महिला पुलिस अधिकारी हमेशा मौजूद रहेगी। पीड़ित को संरक्षण गृह भेजने या परिवार को सौंपने से पहले उसकी सहमति सर्वोपरि होगी। ये निर्देश छोटे नहीं हैं — ये एक पूरी सोच को बदलने का आदेश हैं।

संरचनात्मक सुधार: DSP से लेकर ADGP तक

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया कि रेड और रेस्क्यू ऑपरेशन का नेतृत्व DSP स्तर के अधिकारी करेंगे, जिनमें महिला अधिकारी और NGO सलाहकार शामिल होंगे। प्रत्येक राज्य में ADGP स्तर का अधिकारी मानव तस्करी विरोधी ब्यूरो का प्रभारी होगा। पीड़ित सुरक्षा योजना लागू करने की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव पर होगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि ये निर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद इस विषय पर एक समग्र कानून नहीं बना लेती।

कानूनी सुधारों के मोर्चे पर कोर्ट ने पांच अहम सुझाव दिए। पहला — 1956 के कानून की धारा 7, 8 और 20 के तहत तस्करी की पीड़ित को अपराधी न माना जाए। दूसरा — संरक्षण गृहों के detention-based model के विकल्प तलाशे जाएं ताकि पीड़ितों का पुनर्वास उनकी जरूरत के अनुसार हो। तीसरा — स्वैच्छिक वेश्यावृत्ति के मामलों में भी अधिकार-आधारित सुरक्षा के प्रावधान बनाए जाएं। चौथा — BNS में नाबालिग पीड़ितों के लिए पालेरमो प्रोटोकाल जैसी परिभाषा अपनाई जाए। पांचवां — पुलिस द्वारा पीड़ित के शोषण या उसे समय पर मजिस्ट्रेट के सामने न पेश करने को आपराधिक कृत्य घोषित किया जाए, जैसा विधि आयोग भी सुझा चुका है।

एक राष्ट्र की जिम्मेदारी

संगठित अपराध अनुसंधान एजेंसी (OCIA) के गठन पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्णय लेने का अधिकार दिया। लेकिन संदेश साफ है — पुलिस को प्रशिक्षित करो, संवेदनशील बनाओ, संरक्षण गृहों का माहौल सुधारो। भारत का संविधान हर नागरिक को शोषण से बचाव का मौलिक अधिकार देता है — और इसमें पुनर्वास भी शामिल है।

यह सिर्फ कानूनी बहस नहीं है। यह उन लाखों लड़कियों का सवाल है जो सिस्टम की विफलता की कीमत चुका रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रास्ता दिखा दिया है — अब राज्यों को चलना होगा। जय हिंद।

(लेखक आरके विज छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।)

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