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डिग्री है, पर नौकरी नहीं — भारत के युवाओं का रोजगार संकट सिर्फ बेरोजगारी की कहानी नहीं है

डिग्री है, पर नौकरी नहीं — भारत के युवाओं का रोजगार संकट सिर्फ बेरोजगारी की कहानी नहीं है

भारत की demographic dividend की कहानी दुनिया सुनती है — दुनिया का सबसे युवा देश, सबसे बड़ा workforce, और एक उभरती हुई महाशक्ति। लेकिन इस गर्व की कहानी के बीच एक असुविधाजनक सच्चाई दबी हुई है: देश में 15 से 29 साल के ग्रेजुएट युवाओं में से सिर्फ 26 फीसदी के पास नियमित सैलरी वाली नौकरी है। यानी हर 100 पढ़े-लिखे नौजवानों में 74 लोग या तो बेरोजगार हैं, अनौपचारिक काम में फंसे हैं, या labour force से बाहर ही हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है — यह एक structural failure का आईना है।

सबसे चौंकाने वाली बात नौकरी की quality को लेकर है। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, हर 100 युवा ग्रेजुएट्स में केवल 4 लोगों के पास ऐसी नौकरी है जिसमें लिखित contract, paid leave और social security जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। बाकी जो 22 फीसदी “employed” हैं, वे भी अक्सर अस्थायी, बिना contract के, या कम वेतन वाले काम में जुटे हैं। काम करना और सुरक्षित काम करना — इन दोनों के बीच की खाई भारत में खतरनाक रूप से चौड़ी है।

रिपोर्ट की पूरी तस्वीर और भी जटिल है। 15 से 29 साल के ग्रेजुएट युवाओं में 10 फीसदी self-employed हैं, 11 फीसदी बिना वेतन के पारिवारिक कारोबार में लगे हैं, 3 फीसदी casual या अनियमित काम कर रहे हैं, 15 फीसदी नौकरी तलाश रहे हैं लेकिन बेरोजगार हैं, और पूरे 35 फीसदी labour force का हिस्सा ही नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि डिग्री हासिल करने के बाद भी एक बड़ा तबका या तो हाशिये पर है या फिर अपनी योग्यता से कहीं नीचे के काम पर समझौता कर रहा है।

असल सवाल यह नहीं है कि नौकरियां हैं या नहीं — असल सवाल यह है कि किस तरह की नौकरियां बन रही हैं। भारत का education system हर साल लाखों graduates तैयार करता है, लेकिन industry और academia के बीच की दूरी इतनी बड़ी है कि degrees अक्सर market की जरूरतों से मेल नहीं खातीं। Skill development, vocational training और industry-aligned curriculum — ये सिर्फ policy buzzwords नहीं होने चाहिए, बल्कि इन्हें ground level पर deliver करना होगा।

भारत की युवा आबादी इस देश की सबसे बड़ी ताकत है — यह बात सच है, लेकिन यह ताकत तभी काम आएगी जब इसे dignified, secure और well-paying employment मिले। अगर पढ़े-लिखे नौजवान अनिश्चितता में जीते रहे, तो demographic dividend एक demographic disaster में बदल सकता है। भारत के policy makers, startups, और corporate India — सभी की जिम्मेदारी है कि वे सिर्फ jobs की संख्या नहीं, बल्कि jobs की गुणवत्ता बढ़ाने पर ध्यान दें। यही वह असली चुनौती है जो Viksit Bharat के सपने को या तो पूरा करेगी — या तोड़ेगी।

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