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चीन के 1,814 लड़ाकू विमान बनाम भारत के 600 — J-20, J-35 की आंधी में तेजस MK1A की सुस्त रफ्तार कितनी खतरनाक?

चीन के 1,814 लड़ाकू विमान बनाम भारत के 600 — J-20, J-35 की आंधी में तेजस MK1A की सुस्त रफ्तार कितनी खतरनाक?

एक ऐसे दौर में जब भारत अपनी सैन्य ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का सपना देख रहा है, FlightGlobal की ‘World Air Forces 2026’ डायरेक्टरी ने एक ऐसा आंकड़ा सामने रखा है जिसे नज़रअंदाज़ करना किसी भी जागरूक भारतीय के लिए मुमकिन नहीं। 1 अक्टूबर 2025 तक के डेटा के मुताबिक, चीन के पास लगभग 1,814 लड़ाकू विमान हैं — और भारत के पास महज़ 600। यानी लगभग तीन गुना का फर्क। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह एक भू-राजनीतिक चेतावनी है।

भारतीय वायुसेना की स्वीकृत ताकत 42 स्क्वॉड्रन की है, लेकिन आज वह घटकर सिर्फ 28 स्क्वॉड्रन पर आ गई है। यह गिरावट किसी युद्ध में नहीं हुई — यह हुई है लंबे समय से चली आ रही खरीद की सुस्ती और स्वदेशी उत्पादन की धीमी रफ्तार के कारण। जब उत्तर में चीन और पश्चिम में पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर एक साथ नज़र रखनी हो, तो यह कमी और भी गंभीर हो जाती है।

चीन के बेड़े की बात करें तो वहां सैकड़ों J-10, J-16 और J-20 विमान तैनात हैं। J-20 एक पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर है — रडार की पकड़ में न आने वाला, लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम। इसके मुकाबले भारत के बेड़े में 265 Su-30MKI, 36 राफेल, 44 मिराज 2000, 65 मिग-29, 36 मिग-29K, 124 जगुआर और 31 तेजस Mk1 शामिल हैं। राफेल निस्संदेह एक world-class लड़ाकू विमान है, लेकिन संख्या के मामले में यह बेड़ा चीन की बढ़ती ताकत के सामने पर्याप्त नहीं है।

Royal United Services Institute (RUSI) के ‘Defence Budgets Monitor 2026’ के अनुमानों के अनुसार, 2025 के अंत तक चीन J-20A और J-20S की उत्पादन दर लगभग 120 विमान प्रति वर्ष तक पहुंच चुकी थी। J-16 के लिए यह दर लगभग 100 विमान प्रति वर्ष है और 2025 के अंत तक चीन के पास 450 J-16 होने का अनुमान था। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2030 तक चीन के पास 1,000 J-20 सीरीज और 900 J-16 लड़ाकू विमान हो सकते हैं — एक ऐसी ताकत जो किसी भी पड़ोसी देश की नींद उड़ा दे।

और इधर? तेजस Mk1A की उत्पादन दर सालाना लगभग 24 विमान है, जबकि लक्ष्य 30 का है। भारतीय वायुसेना की न्यूनतम जरूरत 36 से 40 लड़ाकू विमान प्रति वर्ष की है। यह अंतर छोटा नहीं है — यह एक structural gap है जो हर बीतते साल के साथ बड़ा होता जाता है। रूसी और इजरायली प्लेटफॉर्म्स की स्वदेशी असेंबली दर तो इससे भी कम है।

यह तुलना इसलिए नहीं की जा रही कि भारत चीन के साथ विमानों की गिनती की अंधी दौड़ में उतरे। वह न तो ज़रूरी है, न व्यावहारिक। लेकिन जो संख्या पहले से स्वीकृत है, जो स्क्वॉड्रन पहले से मंजूर हैं — उन्हें पूरा करना तो राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियादी शर्त है। Atmanirbhar Bharat का सपना तभी साकार होगा जब HAL की असेंबली लाइनें उस रफ्तार से चलें जो वायुसेना को चाहिए, न जितनी अभी चल रही हैं।

भारत के पास राफेल जैसी quality है, Su-30MKI जैसी range है, और तेजस जैसा स्वदेशी जज्बा भी है। ज़रूरत है तो बस उस execution की — जो इस जज्बे को संख्याओं में बदले, जो सपनों को स्क्वॉड्रन में तब्दील करे। क्योंकि आसमान में ताकत दिखाने के लिए सिर्फ हौसला नहीं, विमान भी चाहिए।

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