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कट्टरपंथियों के आगे झुका पाकिस्तान: लाहौर के हिंदू-सिख नाम बहाल करने की योजना ठंडे बस्ते में

कट्टरपंथियों के आगे झुका पाकिस्तान: लाहौर के हिंदू-सिख नाम बहाल करने की योजना ठंडे बस्ते में

चरमपंथी दबाव में पाकिस्तान ने पलटा अपना ही फैसला

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर लाहौर के ऐतिहासिक हिंदू-सिख नाम बहाल करने की अपनी ही योजना से यू-टर्न ले लिया है। यह वही योजना थी जिसे मुख्यमंत्री मरियम नवाज और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 2025 में बड़े जोश के साथ लॉन्च किया था और जिस पर दुनियाभर में वाहवाही मिली थी।

क्या थी यह योजना?

यह अभियान ‘लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल’ का हिस्सा था — एक बड़े पैमाने का शहरी संरक्षण प्रोजेक्ट जिसकी अनुमानित लागत लगभग 50 अरब पाकिस्तानी रुपये थी। इसका मकसद लाहौर की ऐतिहासिक वास्तुकला, सड़कों, बगीचों और सांस्कृतिक स्थलों को उनकी असली पहचान लौटाना था।

1947 के बंटवारे के बाद लाहौर प्रशासन ने सैकड़ों हिंदू, सिख और ब्रिटिश नामों को इस्लामी नामों में बदल दिया था। इस योजना के तहत उन्हें वापस उनके पूर्व-विभाजन नाम दिए जाने थे।

दो महीनों में नौ जगहों के नाम बदले गए थे

पिछले दो महीनों में लाहौर के कम से कम नौ स्थानों को आधिकारिक तौर पर उनके ऐतिहासिक नामों में वापस बदला जा चुका था। मुख्यमंत्री ऑफिस ने इस संबंध में आधिकारिक हैंडआउट भी जारी किया था।

नवाज शरीफ ने खुद व्यक्तिगत रूप से लाहौर की मूल पहचान बहाल करने पर जोर दिया था — ऐसा प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों ने बताया।

महाराजा रणजीत सिंह की विरासत को भी मिलनी थी जगह

इस प्रोजेक्ट में महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य से जुड़े चर्चों, मंदिरों, गुरुद्वारों और सिख-काल की इमारतों की बहाली भी शामिल थी। खास तौर पर:

यानी यह सिर्फ नाम बदलने का मामला नहीं था — बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की साझा सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करने का एक दुर्लभ कदम था।

अब पलट गई सरकार — “कोई फैसला नहीं हुआ”

लाहौर के डिप्टी कमिश्नर सेवानिवृत्त कैप्टन मुहम्मद अली इजाज ने सोमवार को पाकिस्तानी अखबार डॉन को बताया कि “अभी तक ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है।” यह बयान तब आया जब मुख्यमंत्री ऑफिस पहले ही आधिकारिक हैंडआउट जारी कर चुका था।

साफ है — कट्टरपंथी तत्वों के दबाव में पाकिस्तान सरकार अपने ही ऐलान से पीछे हट गई। यह कोई नई बात नहीं — पाकिस्तान में जब भी अल्पसंख्यकों की विरासत को सम्मान देने की कोशिश हुई, चरमपंथ ने उसे दबा दिया।

भारत के नजरिए से क्या मायने रखता है यह?

लाहौर कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था — महाराजा रणजीत सिंह की शान का केंद्र। वहां की गलियों में हमारी विरासत आज भी जिंदा है, चाहे पाकिस्तान उसे मिटाने की कोशिश करे या नहीं। यह U-टर्न एक बार फिर साबित करता है कि पाकिस्तानी राज्य अपने कट्टरपंथी तत्वों को नियंत्रित करने में नाकाम है।

जो देश अपनी खुद की सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करने से डरे, उससे किसी बड़े बदलाव की उम्मीद रखना बेमानी है।

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