Skip to content
Home » Blog » ‘जननीति भारत’ की नींव: पूर्व IAS दिव्या मित्तल का सियासी सफर और 2027 की बड़ी चुनौती

‘जननीति भारत’ की नींव: पूर्व IAS दिव्या मित्तल का सियासी सफर और 2027 की बड़ी चुनौती

'जननीति भारत' की नींव: पूर्व IAS दिव्या मित्तल का सियासी सफर और 2027 की बड़ी चुनौती

लखनऊ की सत्ता-गलियारों में एक दशक से अधिक समय तक अपनी धाक जमाने वाली 2013 बैच की IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने जिस दिन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) का फैसला लिया, उसी पल से यह तय हो गया था कि उनकी अगली पारी सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि जनता के बीच खेली जाएगी। एक दशक से अधिक समय तक ‘लोक सेवक’ की कुर्सी पर बैठकर नीतियों को जमीन पर उतारने वाली दिव्या ने अब खुद नीतियां बनाने का संकल्प लिया है — और यह महज एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का पहला कदम है।

गुरुवार को मीरजापुर से जारी एक आठ मिनट के वीडियो में दिव्या मित्तल ने औपचारिक रूप से ‘जननीति भारत’ पार्टी के गठन का ऐलान किया। इस वीडियो में उन्होंने वन विभाग की जमीन पर स्कूल न बन पाने और उद्योगों को मुफ्त में जमीन दिए जाने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सीधे सवाल उठाए। महिला सुरक्षा और जनभागीदारी की बात करते हुए उन्होंने उसी सरकारी कार्यसंस्कृति को कटघरे में खड़ा किया, जिसकी अहम कुर्सियों पर वह खुद लंबे समय तक काबिज रही थीं — यह आत्म-आलोचना का साहस ही उन्हें भीड़ से अलग करता है।

दिव्या का मीरजापुर से गहरा नाता रहा है। जिलाधिकारी (DM) के रूप में उन्होंने वहाँ जो काम किए, उसने उन्हें आम जनता के बीच एक विश्वसनीय चेहरा बनाया। VRS लेने के बाद भी जब वह मीरजापुर पहुंचीं, तो जनता ने उनका जोरदार स्वागत किया — यह स्वागत उनकी राजनीतिक संभावनाओं का पहला सार्वजनिक संकेत था। हालांकि उन्होंने अभी तक अपनी चुनावी सीट की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक हलकों में मीरजापुर सदर से उनकी दावेदारी लगभग तय मानी जा रही है।

किसी स्थापित दल में शामिल होने के बजाय खुद की पार्टी बनाने का निर्णय दिव्या की राजनीतिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की सोच को दर्शाता है। उनका दावा है कि ‘जननीति भारत’ में जनता खुद नीतियां तय करेगी और हर काम का हिसाब मांगेगी — यह भाषा GenZ और नए मतदाताओं को सीधे संबोधित करती है, जो पारदर्शिता और जवाबदेही को सबसे ऊपर रखते हैं। पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी असली ‘मेंस परीक्षा’ देगी।

लेकिन यह राह आसान नहीं है। मीरजापुर सदर की सीट पिछले दो विधानसभा चुनावों से BJP के पास है और उससे पहले एक दशक तक सपा का दबदबा रहा। दिव्या के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्रशासनिक लोकप्रियता को वोटों में बदलना एक बिल्कुल अलग कौशल मांगता है — किसी जिले में एक सम्मानित अधिकारी होना और उसी क्षेत्र में बूथ-स्तर तक मजबूत चुनावी संगठन खड़ा करना, ये दोनों दो अलग-अलग दुनियाएं हैं।

इतिहास इस बात का गवाह है। 2010 के IAS टॉपर शाह फैसल ने इस्तीफा देकर 2019 में जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट बनाई, लेकिन राजनीतिक प्रयोग जल्द ही विफल हो गया और वह वापस IAS में लौट आए। पूर्व IAS विजय शंकर पांडेय ने फैजाबाद में — जहाँ वह DM रह चुके थे — 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा और मात्र 2,056 वोट हासिल कर सके। पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर की ‘आजाद अधिकार सेना’, पूर्व DGP सुलखान सिंह की ‘बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी’, पूर्व IAS राम बहादुर की ‘नागरिक एकता पार्टी’ और पूर्व IAS चंद्रपाल की ‘आदर्श समाज पार्टी’ — ये सभी नाम इस बात की याद दिलाते हैं कि अफसरशाही से राजनीति की यात्रा में अनुभव और जनसमर्थन के बीच एक गहरी खाई होती है जिसे पाटना बेहद मुश्किल है।

हाल ही में PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने बरेली के सिटी मैजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देकर ‘राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा’ बनाया है — वह भी इसी कठिन राह पर हैं। यह पूरा परिदृश्य दर्शाता है कि भारत में नौकरशाही से राजनीति में आना एक साहसिक, लेकिन जोखिम भरा कदम है। दिव्या मित्तल के पास जनता का विश्वास, एक स्पष्ट मुद्दा-आधारित एजेंडा और एक ऊर्जावान व्यक्तित्व है — अब देखना यह है कि क्या वह 2027 में इस राजनीतिक ‘मेंस’ में सफल होती हैं, या यह भी एक और महत्वाकांक्षी प्रयोग बनकर रह जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *