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BJP का ‘रावत कार्ड’: प्रियंका सिंह रावत को राज्यसभा भेजकर अवध में 2027 की बिसात बिछाई

BJP का 'रावत कार्ड': प्रियंका सिंह रावत को राज्यसभा भेजकर अवध में 2027 की बिसात बिछाई

BJP ने एक चाल चली है — और यह चाल सिर्फ एक नाम की घोषणा नहीं है, यह 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का पहला बड़ा संकेत है।

सोमवार को जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश की राज्यसभा सीटों के लिए आठ उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो उसमें बाराबंकी की पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत का नाम देखकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। यह फैसला महज एक नियुक्ति नहीं है — यह अवध क्षेत्र के रावत-पासी मतदाताओं तक एक सुविचारित राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश है, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथ से फिसल गए थे।

प्रियंका सिंह रावत 2014 में बाराबंकी से भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीती थीं, जब उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन सांसद पीएल पुनिया को 2.11 लाख से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हराया था। 2019 में पार्टी ने उनका टिकट काट दिया, लेकिन प्रियंका ने संगठन नहीं छोड़ा — वे सक्रिय रहीं और प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। अब राज्यसभा की उम्मीदवारी के जरिए पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर केंद्र में लाने का स्पष्ट संकेत दिया है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने अवध क्षेत्र में भाजपा को जो झटका दिया, वह पार्टी के रणनीतिकारों को अभी भी चुभता है। अयोध्या — राम मंदिर की भूमि — से सपा के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को हराया। यह हार सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं था, यह एक प्रतीकात्मक झटका था जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। उसी चुनाव में बाराबंकी में भाजपा की प्रत्याशी राजरानी रावत को कांग्रेस गठबंधन के तनुज पुनिया ने 2.15 लाख से अधिक वोटों के अंतर से हराया। दोनों सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं और दोनों पर पासी समाज का मतदाता निर्णायक भूमिका में माना जाता है।

राजनीतिक विश्लेषक बाराबंकी, रायबरेली, अमेठी, लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और गोंडा जैसे जिलों में पासी मतदाताओं को चुनावी समीकरण को पलटने में सक्षम सामाजिक समूह मानते हैं। यही वजह है कि प्रियंका रावत को राज्यसभा भेजने के फैसले को भाजपा की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है — एक ऐसी रणनीति जो 2027 से पहले अवध में जमीन दोबारा मजबूत करने के लिए बनाई गई है।

यह पहली बार नहीं है जब भाजपा ने बाराबंकी के रावत-पासी समीकरण को साधने के लिए सोचा-समझा कदम उठाया हो। 2024 में पूर्व सांसद बैजनाथ रावत को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। उनकी नियुक्ति में 65 वर्ष की आयु सीमा तकनीकी अड़चन बनी, तो सरकार ने कानून में ही बदलाव कर दिया — ताकि 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति भी आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य बन सकें। उस समय इस कदम को पासी और कोरी वोट बैंक को साधने की रणनीति के रूप में व्यापक रूप से देखा गया था। प्रियंका की राज्यसभा एंट्री उसी रणनीतिक श्रृंखला की अगली कड़ी है।

प्रियंका सिंह रावत के लिए यह राज्यसभा की सीट सिर्फ सम्मान की वापसी नहीं है — यह एक बड़ी जिम्मेदारी का आगाज है। अगर भाजपा उन्हें अवध में रावत-पासी समाज के बीच फिर से सक्रिय करती है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें संगठन और समाज के बीच एक मजबूत सेतु की भूमिका निभानी होगी। 2024 के चुनाव में भाजपा के पक्ष में रावत-पासी समर्थन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं थीं, लेकिन अंतिम नतीजों ने साफ कर दिया कि यह समर्थन मतपेटी तक नहीं पहुंचा। राजरानी रावत की बड़ी हार इसकी गवाह है।

यही वजह है कि राज्यसभा में प्रियंका रावत की एंट्री को दिल्ली के किसी एयर-कंडीशन्ड दफ्तर तक सीमित नहीं माना जा रहा। पार्टी चाहती है कि वे अवध की जमीन पर उतरें, उस सामाजिक आधार को फिर से जोड़ें जो 2024 में बिखर गया था, और 2027 तक भाजपा के लिए एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ तैयार करें जो चुनावी मैदान में असली फर्क डाले। BJP का ‘रावत कार्ड’ खेला जा चुका है — अब देखना यह है कि यह दांव कितना कारगर साबित होता है।

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