छोड़कर सामग्री पर जाएँ
Home » Blog » सबरीमाला केस: “मैं भी एक शबरी हूं” — सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदिरा जयसिंह ने रामायण से दी दमदार दलील

सबरीमाला केस: “मैं भी एक शबरी हूं” — सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदिरा जयसिंह ने रामायण से दी दमदार दलील

सबरीमाला केस: "मैं भी एक शबरी हूं" — सुप्रीम कोर्ट में वकील इंदिरा जयसिंह ने रामायण से दी दमदार दलील

9 जजों की संविधान पीठ के सामने गूंजी शबरी की कहानी

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमाला मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान रामायण की शबरी कथा का भावनात्मक जिक्र हुआ। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कोर्टरूम में कहा — “मैं भी एक शबरी हूं, मुझे मंदिर से क्यों रोका जाए?”

कौन सुन रहा है यह मामला?

इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ कर रही है, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत कर रहे हैं। पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

किसकी तरफ से पेश हुईं इंदिरा जयसिंह?

वकील इंदिरा जयसिंह बिंदू अमिनी और कनकदुर्गा की ओर से पेश हुईं — वही दो महिलाएं जिन्होंने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया था। जैसे ही पीठ आज की सुनवाई समाप्त करने वाली थी, जयसिंह ने शबरी प्रसंग उठाया।

कोर्ट में क्या बोलीं इंदिरा जयसिंह?

जयसिंह ने कहा, “शबरी कौन थीं? आप सभी ने रामायण पढ़ी है।” उन्होंने बताया कि शबरी एक बुजुर्ग आदिवासी महिला थीं, जिन्होंने भगवान राम के प्रति अटूट भक्ति रखी और उन्हें बेर अर्पित किए।

उन्होंने पौराणिक कथा का हवाला देते हुए कहा कि शबरी जीवन भर भगवान राम से मिलने की प्रतीक्षा करती रहीं। जब उन्हें सुनाई दिया कि राम सबरीमालाई आ रहे हैं, तो उनका सपना साकार होने वाला था।

‘सबरीमालाई’ का अर्थ और आदिवासी जड़ें

जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि ‘मालाई’ का अर्थ होता है पहाड़ी — और पहाड़ियों पर आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सबरीमाला मूलतः आदिवासी संस्कृति और भक्ति का केंद्र है।

शबरी के बेर — भक्ति की पराकाष्ठा

वकील ने भावनात्मक अंदाज में बताया कि शबरी के पास धन नहीं था, इसलिए उन्होंने भगवान राम को बेर भेंट करने का निर्णय लिया। लेकिन उन्होंने पहले हर बेर को चखा — ताकि कोई कड़वा बेर भगवान के मुख तक न पहुंचे।

यह प्रसंग निस्वार्थ भक्ति का प्रतीक है — और जयसिंह ने इसी भावना से कोर्ट में सवाल उठाया कि ऐसी भक्ति रखने वाली महिलाओं को मंदिर से क्यों रोका जाए?

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *