पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ सीधे सवाल से बचे
मक्का में शुक्रवार को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए — जिसे ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ नाम दिया गया है। लेकिन इस समझौते के बाद जब एक टीवी एंकर ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ से सीधा सवाल पूछा — कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच दोबारा सैन्य संघर्ष हुआ, तो क्या तुर्की और सऊदी अरब पाकिस्तान को हथियार और सैन्य मदद देंगे — तो उनका गला सूख गया। साफ जवाब नहीं आया।
यह वही पाकिस्तान है जो हर मंच पर “मुस्लिम एकता” का राग अलापता है, लेकिन जब असली सवाल आया तो रक्षा मंत्री बोले — “समझौते पर आज ही साइन हुए हैं, डिटेल पर अभी बात करना सही नहीं होगा।” यानी Islamabad के पास अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं है।
क्या है ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’?
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच तीन बड़े मुस्लिम देशों ने यह समझौता किया है। इसकी बुनियादी शर्त यह है कि अगर इनमें से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा — ठीक NATO के आर्टिकल 5 की तर्ज पर।
तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने खुद इस तुलना को स्वीकार किया और कहा कि यह समझौता तकनीकी रूप से NATO चार्टर के आर्टिकल 5 जैसा ही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह डील ईरान के खिलाफ नहीं है और किसी खास देश को निशाना नहीं बनाती।
समझौते की असली कमज़ोरी
इस डील में सबसे बड़ा grey area यह है कि हमले की स्थिति में बाकी दो देश किस तरह की सैन्य मदद देंगे — यह कहीं स्पष्ट नहीं किया गया। क्या वे सीधे युद्ध में उतरेंगे? क्या सिर्फ हथियार देंगे? या केवल राजनीतिक समर्थन तक सीमित रहेंगे? इन सवालों का जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है।
तुर्की के उपराष्ट्रपति जेवडेट यिलमाज ने कहा कि यह पूरी तरह रक्षात्मक समझौता है और किसी देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया। लेकिन यह “रक्षात्मकता” कितनी दूर तक जाएगी — यही असली सवाल है जिसका जवाब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री नहीं दे सके।
भारत की स्थिति मज़बूत, पाकिस्तान की कूटनीति कमज़ोर
यह समझौता जितना बड़ा दिखता है, उतना असरदार शायद न हो। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का टालमटोल वाला जवाब खुद यह बता देता है कि इस डील की ज़मीनी हकीकत अभी बहुत कमज़ोर है। कागज़ पर NATO जैसी दिखने वाली डील और असली NATO में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है।
भारत ने हाल के वर्षों में अपनी रक्षा क्षमताओं को जिस तेज़ी से मज़बूत किया है — स्वदेशी हथियार प्रणालियां, Quad की सदस्यता, और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था — वह किसी भी गठबंधन के सामने एक ठोस जवाब है। भारत की ताकत किसी के मुंह से मांगे गए हथियारों पर नहीं, बल्कि अपनी आत्मनिर्भरता पर टिकी है।

