बात शुरू होती है यूक्रेन युद्ध के उन शुरुआती दिनों से, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगाने शुरू किए। उस वक्त भारत ने एक साफ और सॉवरेन फैसला लिया — रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखेंगे। 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरत किसी की नाराजगी से बड़ी है। यह फैसला तब भी सही था। आज भी सही है।
उसके बाद के महीनों में भारत-रूस तेल व्यापार तेजी से बढ़ता गया। 2022 से पहले रूस की हिस्सेदारी भारत के कुल तेल आयात में 15% से भी कम थी। लेकिन जैसे-जैसे Gulf में तनाव बढ़ा और global market में तेल के दाम उछले, भारत ने अपनी energy security के लिए रूस के साथ डील मजबूत की। जुलाई 2026 में अकेले एक महीने में भारत ने रूस से 7.27 अरब डॉलर का crude oil import किया — जो उस महीने के कुल 14.21 अरब डॉलर के तेल आयात का 51.1% था। यानी आधे से ज्यादा तेल अकेले रूस से।
Washington इस तस्वीर को बहुत देर से देख रहा था। अमेरिकी Congress ने एक नया हथियार तैयार किया — ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act 2026’। House of Representatives ने इसे 262-159 के भारी बहुमत से पास किया। Senate पहले ही हां कह चुकी थी।
फिर आया वो पल जिसका पूरी दुनिया को इंतजार था। राष्ट्रपति Donald Trump ने इस बिल पर दस्तखत कर दिए — और यह कानून बन गया। इस कानून के तहत अब अमेरिकी राष्ट्रपति को यह सीधी legal power मिल गई है कि वो रूस से crude oil या natural gas खरीदने वाले किसी भी देश के सामान पर 100% तक tariff लगा सकते हैं। निशाने पर हैं रूस के top-5 तेल खरीदार — और उस list में भारत और चीन सबसे ऊपर हैं।
भारतीय बाजारों में खबर फैलते ही एक सवाल हर जगह गूंजने लगा — क्या कल से ही भारतीय सामान अमेरिका में दोगुने महंगे हो जाएंगे? Global Trade Research Initiative (GTRI) और आर्थिक विशेषज्ञों ने साफ किया कि तुरंत 100% tariff लागू होने की संभावना बेहद कम है। यह कानून Trump को power देता है — लेकिन उस power का इस्तेमाल कब, कितना और किन products पर होगा, यह फैसला अभी बाकी है।
इस कानून में एक और अहम clause है। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति चाहें तो ‘राष्ट्रीय हित’ का हवाला देकर किसी भी देश को इस tariff से छूट दे सकते हैं। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि Trump असल में इस कानून को एक ‘mastercardकी तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं — भारत के साथ चल रही trade deal में अपनी शर्तें मनवाने के लिए, न कि सचमुच 100% tariff लगाने के लिए।
इसके बावजूद दांव बड़ा है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों (अप्रैल-अगस्त 2026-27) में भारत ने अमेरिका को 42.8 अरब डॉलर का सामान export किया — कपड़े, दवाइयां, IT services, gems और engineering goods। लाखों भारतीयों की नौकरी इस trade से सीधे जुड़ी है। अगर Washington ने अतिरिक्त tariff लगाया, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय products पिछड़ेंगे और हमारे exporters को भारी नुकसान होगा।
लेकिन नई दिल्ली ने झुकने से साफ इनकार कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दो टूक कहा — भारत सरकार की पहली जिम्मेदारी 140 करोड़ नागरिकों को सस्ती और निरंतर ऊर्जा मुहैया कराना है, और इससे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होगा। MEA ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत को market conditions और राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया के किसी भी देश से तेल खरीदने का पूरा अधिकार है।
Washington के सामने भी यह बात रख दी गई है — एकतरफा tariff जैसे कदम दोनों देशों के बढ़ते strategic partnership को नुकसान पहुंचाएंगे और global oil market को अस्त-व्यस्त करेंगे। सरकार ने भारतीय exporters को भरोसा दिलाया है कि trade bodies के साथ मिलकर काम जारी है ताकि किसी के business पर आंच न आए।
अब USTR को हर 180 दिनों में रूस से तेल खरीदने वाले देशों की list की समीक्षा करनी होगी — यानी यह कूटनीतिक और आर्थिक दबाव लगातार बना रहेगा। आने वाले हफ्तों में नई दिल्ली और Washington के diplomats की मेज पर होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि दोनों देश इस मुश्किल equation को कैसे सुलझाते हैं। एक बात तय है — भारत अपनी energy sovereignty से पीछे नहीं हटेगा। यह कोई जिद नहीं, यह 140 करोड़ लोगों की जरूरत है।

