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टैगोर की विरासत अब ब्रिटेन तक — विश्वभारती और ग्रीनविच यूनिवर्सिटी के बीच ऐतिहासिक MoU

टैगोर की विरासत अब ब्रिटेन तक — विश्वभारती और ग्रीनविच यूनिवर्सिटी के बीच ऐतिहासिक MoU

भारत की सांस्कृतिक शक्ति एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ने को तैयार है। विश्वभारती विश्वविद्यालय के कला भवन और ब्रिटेन की प्रतिष्ठित ग्रीनविच यूनिवर्सिटी के बीच हाल ही में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए हैं — और यह महज एक academic partnership नहीं है। यह उस civilizational confidence का प्रतीक है जिसमें भारत अब दुनिया को अपनी शर्तों पर अपनी कला, अपनी दृष्टि और अपने महान विचारकों से परिचित करा रहा है। थीसिस सीधी है: रवींद्रनाथ टैगोर की कला-दर्शन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आज, दशकों बाद, ब्रिटिश विश्वविद्यालय खुद शांतिनिकेतन के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हैं।

इस समझौते के तहत ग्रीनविच यूनिवर्सिटी के डिजाइन विभाग के प्रोफेसर डेविड मैकडावेल वाटरवर्थ और इयान थाम्पसन शांतिनिकेतन में कला भवन के विद्यार्थियों के साथ workshops, artistic practice sessions और open discussions में भाग ले रहे हैं। 12 अगस्त तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत कला भवन की नंदन कला दीर्घा में हुई — वही दीर्घा जो नंदलाल बोस जैसे महान कलाकारों की विरासत को आज भी जीवित रखती है। जब ब्रिटिश professors इस परिसर को “एक खुली कला दीर्घा” कहते हैं, तो यह तारीफ नहीं — यह एक स्वीकृति है।

कला भवन के प्राचार्य शिशिर साहना ने स्पष्ट किया कि इस exchange का असली उद्देश्य ब्रिटिश छात्रों को उन कलात्मक परंपराओं से जोड़ना है जिनकी जड़ें ग्रामीण भारत और टैगोर के समग्र शिक्षा-दर्शन में हैं — वह दर्शन जो प्रकृति, मनुष्य और सृजन को एक अखंड इकाई मानता है। यह वही सोच है जो पश्चिमी industrial art education से मौलिक रूप से अलग है, और आज की दुनिया में जिसकी प्रासंगिकता तेज़ी से बढ़ रही है। साथ ही, कला भवन के विद्यार्थियों को ब्रिटिश कला परंपराओं और contemporary design practices सीखने का अवसर मिलेगा — यह एक genuinely reciprocal exchange है, जहाँ भारत सिर्फ “लेने वाला” नहीं, बल्कि बराबरी का साझेदार है।

शांतिनिकेतन से थाईलैंड, फ्रांस, नीदरलैंड तक — भारत की soft power का विस्तार

यह अकेला समझौता नहीं है। साहना ने बताया कि विश्वभारती के थाईलैंड, फ्रांस और नीदरलैंड के संस्थानों के साथ भी MoUs हो चुके हैं, जिनके ज़रिए भारतीय विद्यार्थी इन देशों में जाकर workshops में भाग ले सकते हैं। यानी शांतिनिकेतन — जिसे टैगोर ने एक सदी पहले एक खुले आकाश के नीचे शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित किया था — आज एक global creative hub बन रहा है। 1890 में स्थापित ग्रीनविच यूनिवर्सिटी जैसी संस्था का इस partnership में शामिल होना यह साबित करता है कि भारत की intellectual और artistic legacy को दुनिया अब serious academic terms में स्वीकार कर रही है।

यह वह भारत है जो अपनी विरासत को संग्रहालय में नहीं रखता — वह उसे जीता है, फैलाता है, और दुनिया को उसमें शामिल होने का न्योता देता है। टैगोर की कला-दृष्टि आज ब्रिटेन के classrooms तक पहुँच रही है। यही है असली Vishwabharati — सचमुच विश्व की भारती।

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