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ग्वादर: वो एक फैसला जिसने भारत की किस्मत बदल दी — और चीन को अरब सागर तक पहुंचा दिया

ग्वादर: वो एक फैसला जिसने भारत की किस्मत बदल दी — और चीन को अरब सागर तक पहुंचा दिया

ग्वादर आज पाकिस्तान का है, चीन का CPEC वहां से गुजरता है, और भारत चाबहार पर निर्भर है। लेकिन 1956 में एक अलग कहानी लिखी जा सकती थी — अगर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ओमान के सुल्तान का वो ऑफर स्वीकार किया होता।

अरब सागर के मुहाने पर, होर्मुज स्ट्रेट के ठीक करीब बसा ग्वादर बंदरगाह 1783 से ओमान के सुल्तान के नियंत्रण में था। 1956 के आसपास, जब ओमान के लिए इस दूरदराज तटीय इलाके का प्रशासन चलाना आर्थिक और सैन्य दृष्टि से भारी पड़ने लगा, तो सुल्तान ने इसे बेचने का फैसला किया। उस दौर में भारत-ओमान संबंध बेहद प्रगाढ़ थे — ओमान का शाही परिवार भारतीय प्रशासनिक तंत्र पर गहरा भरोसा करता था, और ग्वादर का प्रशासन कई मायनों में भारत पर निर्भर था। इसीलिए सुल्तान ने पहला अनौपचारिक प्रस्ताव नेहरू को भेजा — पाकिस्तान को नहीं।

नेहरू ने ऑफर क्यों ठुकराया?

नेहरू के इनकार के पीछे तीन तर्क थे। पहला, सैन्य व्यावहारिकता — ग्वादर भारत की मुख्य भूमि से सीधे नहीं जुड़ा था और चारों तरफ से पाकिस्तान से घिरा था। सीमित नौसैनिक क्षमता के साथ एक अलग-थलग एन्क्लेव की सुरक्षा करना उन्हें असंभव लगा। दूसरा, आर्थिक प्राथमिकता — तब ग्वादर कोई आधुनिक बंदरगाह नहीं, मछुआरों का एक छोटा गांव था। नए स्वतंत्र हुए भारत में गरीबी और खाद्यान्न संकट से जूझते हुए वहां भारी निवेश करना उन्हें व्यावहारिक नहीं लगा। तीसरा, गुटनिरपेक्षता की नीति — नेहरू को डर था कि ग्वादर खरीदने से पाकिस्तान इसे उकसावे के रूप में देखेगा और द्विपक्षीय रिश्ते और बिगड़ेंगे।

भारत के इनकार के बाद ओमान ने 8 सितंबर 1958 को महज 30 लाख पाउंड में ग्वादर पाकिस्तान को बेच दिया। और इसी के साथ भारत के हाथ से एक ऐसा भूराजनीतिक हथियार निकल गया, जिसकी कीमत आज खरबों डॉलर में आंकी जाती है।

सोचिए — अगर ग्वादर भारत के पास होता, तो तस्वीर कुछ ऐसी होती:

रक्षा विशेषज्ञ आज भी इस चूक पर अफसोस जताते हैं। ग्वादर का हाथ से निकलना महज एक बंदरगाह की हानि नहीं थी — यह पश्चिम एशिया में भारत की संभावित सामरिक सर्वोच्चता का अंत था। नेहरू के तर्क उस वक्त की सोच के हिसाब से समझ में आते हैं, लेकिन दूरदर्शिता की कमी ने भारत को दशकों पीछे धकेल दिया। आज जब भारत हिंद-प्रशांत में अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहा है, चाबहार पर दांव लगा रहा है और CPEC को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है — तब यह सवाल और भी तीखा हो जाता है: काश, 1956 में वो फैसला अलग होता।

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