उत्तर प्रदेश की धरती पर हिंदू सभ्यता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर गांव, हर मोड़ पर कोई न कोई प्राचीन शक्तिपीठ आपको अपनी ओर खींचती है। गोंडा जिले के विकासखंड रुपईडीह स्थित ग्राम सभा देवरिया कला में विराजमान सम्मय माता मंदिर ऐसी ही एक जीवंत आस्था का प्रमाण है — करीब ढाई सौ साल पुराना, अटूट श्रद्धा से भरा और आज भी उतना ही प्रासंगिक। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है; यह भारत की उस अखंड सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता उदाहरण है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी सरकारी प्रचार के, केवल लोक-आस्था के बल पर जीवित रहती है।
मंदिर के मुख्य पुजारी प्रेम कुमार मिश्रा बताते हैं कि जहां आज यह भव्य मंदिर खड़ा है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। पूर्वजों की स्मृति में माताजी यहां पिंडी रूप में विराजमान थीं — बिना किसी भव्य निर्माण के, केवल दिव्य शक्ति के प्रतीक के रूप में। कुछ वर्षों पहले गांव वालों और आसपास के क्षेत्र के सहयोग से इस स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ, और आज यह पूरे इलाके की आस्था का केंद्र बन चुका है। यह वही भारत है जो ऊपर से आए किसी फरमान का नहीं, बल्कि जन-जन की भावना का निर्माण करता है।
मान्यता जो सदियों से चली आ रही है
सम्मय माता मंदिर की मान्यता उतनी ही सरल है जितनी गहरी। पुजारी मिश्रा जी स्पष्ट करते हैं कि यहां न कोई दरबार लगता है, न झाड़-फूंक होती है। केवल सच्चे मन से पांच सोमवार या पांच शुक्रवार माता के दर्शन करने से भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है — यही इस मंदिर की अद्भुत विशेषता है। यह सनातन परंपरा की वह शक्ति है जो आडंबर से नहीं, निष्ठा से चलती है। ग्रामीण प्रवीन शास्त्री बताते हैं कि सम्मय माता उनके गांव की कुलदेवी हैं और सदियों से विवाह के अवसर पर दूल्हे यहां दर्शन करने आते हैं — एक परंपरा जो आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी पहले थी।
हर सोमवार और शुक्रवार को मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल होता है। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के दौरान तो श्रद्धालुओं की भीड़ का आलम ही अलग होता है — भागवत कथा, विशाल भंडारा और भक्तिमय वातावरण मिलकर इस स्थान को एक तीर्थ का रूप दे देते हैं। गोंडा जिले के साथ-साथ बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, गोरखपुर और यहां तक कि नेपाल से भी हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं — यह तथ्य अपने आप में बताता है कि इस मंदिर की आध्यात्मिक शक्ति किसी राज्य या सीमा की मोहताज नहीं।
सम्मय माता मंदिर की यह कहानी दरअसल उस बड़े सत्य की ओर इशारा करती है जिसे आज की पीढ़ी को समझना चाहिए — कि भारत की असली ताकत उसके मंदिरों, उसकी लोक-परंपराओं और उसकी जनता की अटूट आस्था में है। जब दुनिया की तमाम सभ्यताएं उठीं और गिरीं, तब भी गोंडा के एक छोटे से गांव में माताजी की पिंडी अपनी जगह पर विराजमान रही। यही है भारत की सनातन शक्ति — और यही हमारी सबसे बड़ी विरासत।

