अमेरिका का नया टैरिफ प्रस्ताव — भारत पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क की तलवार
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत से आयात पर 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम के Section 301 के तहत 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उस जांच के बाद आया है जिसमें 60 अर्थव्यवस्थाओं में बंधुआ मजदूरी से उत्पादित सामग्री के आयात के खिलाफ सुरक्षा उपायों की पड़ताल की गई।
जांच का दायरा — सवाल उठना लाजमी है
USTR ने सभी 60 अर्थव्यवस्थाओं को इस मामले में “कमतर” करार दिया। कनाडा, EU, UK और ऑस्ट्रेलिया पर 10% जबकि भारत और कई अन्य देशों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क का प्रस्ताव है।
यह जांच अमेरिका के कुल आयात के लगभग 99% हिस्से को कवर करती है और हर एक में कमी पाती है — यह लक्षित प्रवर्तन कम, नए शुल्कों के लिए कानूनी जामा तलाशने जैसा ज़्यादा दिखता है।
भारत के किन सेक्टर्स पर खतरा?
USTR की रिपोर्ट ने कई अहम क्षेत्रों में जोखिम चिह्नित किए हैं। इनमें शामिल हैं:
USTR ने एक अलग जांच में भारत सहित 16 अर्थव्यवस्थाओं के विनिर्माण क्षेत्रों में “संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता” का मुद्दा भी उठाया है — जो आमतौर पर चीन के राज्य-प्रेरित मॉडल से जोड़ा जाता है। भारत को उसी कटघरे में खड़ा करना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ट्रंप एजेंडा — शुल्क ही हथियार, शुल्क ही नीति
जब अदालतों ने ट्रंप प्रशासन के आपातकालीन जवाबी शुल्क को खारिज कर दिया, तब अमेरिका ने वैकल्पिक कानूनी रास्ते अपनाने शुरू किए। Section 122 के तहत अस्थायी शुल्क लगाए गए जो जल्द समाप्त होने वाले हैं।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि व्यापार घाटा अमेरिका के साथ “अन्याय” का सबूत है और शुल्क ही इसका इलाज। मार्च में USTR ने Section 301 के तहत दो बड़ी जांच शुरू कीं — यह उसी रणनीति का हिस्सा है।
भारत की स्थिति — बातचीत जारी, लेकिन अनिश्चितता बरकरार
बुधवार को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत Section 301 परामर्श प्रक्रिया में संलग्न रहेगा और इस वर्ष की शुरुआत में घोषित प्रारूप व्यापार समझौते को आगे बढ़ाएगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यह समझौता 99% तक पूरा हो चुका था और डील होने पर Section 301 शुल्क नहीं लगाया जाएगा। लेकिन USTR के इस नए प्रस्ताव ने वार्ता को और जटिल बना दिया है।
असली चुनौती — अमेरिका में कुछ भी “फाइनल” नहीं
अन्य देशों के अनुभव बताते हैं कि अमेरिका समझौते के बाद भी नई शर्तें थोप सकता है। ऐसे में भारत सरकार को अमेरिकी वार्ताकारों के सामने अपना पक्ष और भी मजबूती से रखना होगा।
यह अनिश्चितता सिर्फ भारत तक सीमित नहीं — अमेरिकी प्रशासन अपने सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को निशाना बना रहा है। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं और दुनियाभर में आर्थिक अनिश्चितता और गहरी हो सकती है।

