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डिपोर्टेशन की कगार पर खड़ा था अब्दुल रहीम — फिर Karnataka High Court ने क्यों लगाई रोक?

डिपोर्टेशन की कगार पर खड़ा था अब्दुल रहीम — फिर Karnataka High Court ने क्यों लगाई रोक?

यह मामला है क्या?

बेंगलुरु के एक डिटेंशन सेंटर में बंद एक शख्स को सरकार बांग्लादेश भेजने ही वाली थी — और तभी Karnataka High Court ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया।

मार्च 2025 में बेंगलुरु पुलिस ने संदिग्ध अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए एक विशेष अभियान चलाया। इसी मुहिम के दौरान अब्दुल रहीम को हिरासत में लिया गया। Bengaluru के Foreign Regional Registration Office (FRRO) ने उसे मोहम्मद रहीम हावलदार नाम का अवैध बांग्लादेशी नागरिक घोषित कर दिया और Foreigners Act के तहत डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी। कागज़ात तैयार हो चुके थे, सरहद पार भेजने की तारीख तय होने वाली थी — लेकिन किस्मत ने पलटी मारी।

हाईकोर्ट में क्या हुआ जो सब बदल गया?

Justice Suraj Govindaraj की अदालत में अब्दुल रहीम ने दो टूक कहा — वह कोई घुसपैठिया नहीं, बल्कि अप्रैल 1979 में नई दिल्ली के सीमापुरी में जन्मा भारतीय नागरिक है। उसने दावा किया कि वह किसी गहरी साजिश और गलत पहचान का शिकार हुआ है, और इस देश की मिट्टी से उसका रिश्ता दशकों पुराना है।

जैसे ही अदालत को भनक लगी कि इस मामले में कोई बड़ी चूक हो सकती है, Justice Govindaraj ने बिना एक पल गंवाए डिपोर्टेशन के आदेश पर तत्काल स्टे लगा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट हुक्म दिया — बिना पुख्ता सत्यापन के कोई कदम नहीं उठाया जाएगा।

रहीम ने अदालत में कौन से सबूत पेश किए?

अब्दुल रहीम ने खुद को भारतीय साबित करने के लिए दस्तावेजों की एक ठोस फेहरिस्त अदालत के सामने रखी — जन्म प्रमाण पत्र, Aadhaar Card, PAN Card, भारतीय Passport, Voter ID Card और Driving Licence। यही नहीं, उसने यह भी बताया कि वह बेंगलुरु में एक सरकार-पंजीकृत Waste Management और Scrap Trading का व्यवसाय चलाता है, जिसके पास वैध GST Registration Certificate भी मौजूद है।

उसकी सबसे बड़ी दलील यह थी कि उसे बिना किसी नोटिस के डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई — जो उसके और उसके परिवार के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। यह तर्क अदालत ने गंभीरता से लिया।

क्या पहले भी कोई अदालत इस मामले में आई थी?

हां — और यही इस केस को और पेचीदा बनाता है। Karnataka High Court ने यह भी नोट किया कि उत्तर प्रदेश की एक सत्र अदालत ने रहीम को बांग्लादेश से अवैध प्रवेश के मामले में दोषी ठहराया था। रहीम ने उस फैसले को Allahabad High Court में चुनौती दी है, जहां मामला अभी लंबित है। दो अलग-अलग अदालतों में चल रहे इन समानांतर मुकदमों ने यह सवाल और पुख्ता कर दिया कि रहीम की असली पहचान क्या है — और क्या सिस्टम ने कहीं बड़ी गलती की है।

आगे क्या होगा?

Karnataka High Court ने FRRO को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कोई भी अगला कदम उठाने से पहले रहीम की असली पहचान का पूर्ण और स्वतंत्र सत्यापन किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी।

यह केस सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है — यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है कि जब राज्य किसी को “अवैध घुसपैठिया” घोषित करता है, तो उस प्रक्रिया में due process और नागरिक अधिकारों की रक्षा कितनी सुनिश्चित होती है। भारत की न्यायपालिका ने एक बार फिर दिखाया कि सिस्टम की जल्दबाजी पर लगाम लगाना उसका संवैधानिक दायित्व है — और वह इस दायित्व से पीछे नहीं हटती।

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