यह नया अमेरिकी कानून है क्या?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने हाल ही में ‘Sanctioning Russia and Iran Act’ पारित किया है — एक ऐसा कानून जो रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। यह बिल अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा गया है, और अगर वे इस पर हस्ताक्षर करते हैं, तो यह अमेरिका की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव होगा। इस कानून का घोषित उद्देश्य यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को आर्थिक रूप से कमजोर करना है — रूसी अधिकारियों, बैंकों, ऊर्जा संस्थाओं और रूस के सैन्य अभियानों को support करने वाली विदेशी कंपनियों को निशाना बनाकर। कागज़ पर यह कानून चीन और भारत दोनों को affect करता है, क्योंकि दोनों देश रूसी energy के बड़े खरीदार हैं। लेकिन असल खेल कुछ और ही है।
यह समझना ज़रूरी है कि यह कानून सिर्फ रूस को दंडित करने के बारे में नहीं है — यह उन देशों को भी दबाव में लाने की कोशिश है जो अमेरिकी विदेश नीति के साथ कदम से कदम नहीं मिलाते। और इस पूरे equation में भारत की स्थिति सबसे ज़्यादा vulnerable दिखती है, जबकि चीन को अमेरिका खुलकर छेड़ने से बचता है।
चीन का नाम क्यों, और असली निशाना भारत क्यों?
Atlantic Council के Senior Fellow माइकल कुगेलमैन ने इस पर बेबाकी से कहा कि पिछले एक साल से ज़्यादा समय में अमेरिका-भारत संबंधों को कई बड़े झटके लगे हैं, और यह नया प्रतिबंध बिल शायद अब तक का सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है। उन्होंने एक बेहद अहम बात की तरफ ध्यान दिलाया — इस कानून के तहत अमेरिका, चीन के मुकाबले भारत पर ज़्यादा टैरिफ लगा सकता है, जबकि हकीकत यह है कि चीन, भारत से कहीं ज़्यादा रूसी तेल खरीदता है। यह कोई पहली बार नहीं होगा — ऐसा precedent पहले भी बन चुका है। कुगेलमैन का कहना है कि अमेरिकी सरकार जानती है कि global economy पर चीन का दबदबा इतना भारी है कि उसे directly provoke करना अमेरिका के लिए भी महंगा पड़ेगा।
यही वह असली geopolitical calculus है जिसे समझना ज़रूरी है। चीन को छेड़ना अमेरिका के लिए economically risky है, इसलिए भारत को “example” बनाया जाता है — भले ही भारत की रूसी तेल खरीद चीन से कम हो। यह double standard नहीं तो और क्या है?
भारत की विदेश नीति पर यह हमला क्यों है?
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व advisor और भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाने वाले इवान ए. फीगेनबाम ने इस मुद्दे पर बहुत सटीक बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि जब Peter Navarro ने यूक्रेन युद्ध को “मोदी का युद्ध” कहा था, तब भी उन्होंने यही कहा था — और आज भी उनकी बात वही है। भारत इस युद्ध को अपनी वजह से पैदा हुई समस्या नहीं मानता, और इसीलिए नई दिल्ली इस अमेरिकी दबाव को सीधा हस्तक्षेप मानती है — भारत की संप्रभु विदेश नीति में दखल, भारत की energy ज़रूरतों के लिहाज़ से अव्यावहारिक, और पश्चिम की उस सामूहिक नाकामी का बोझ भारत पर डालने की कोशिश जिसमें वे Moscow को युद्ध रोकने के लिए राजी नहीं कर पाए।
फीगेनबाम की यह बात बिल्कुल सही है — भारत ने यूक्रेन युद्ध शुरू नहीं किया, न ही भारत किसी एक पक्ष का हथियार है। Strategic autonomy भारत की विदेश नीति की रीढ़ है, और इसे compromise करने का दबाव डालना भारत-अमेरिका रिश्तों की बुनियाद को कमज़ोर करता है।
25 साल की कूटनीतिक मेहनत दांव पर
फीगेनबाम ने जो सबसे चिंताजनक बात कही, वह यह है कि पिछले डेढ़ साल में अमेरिका-भारत संबंधों को मज़बूत करने के लिए 25 सालों की bipartisan कोशिशें — जिनमें ट्रंप का पहला कार्यकाल भी शामिल है — बर्बाद होती दिख रही हैं। दोनों देशों ने मिलकर एक ऐसा रिश्ता बनाया था जो Washington और New Delhi दोनों में राजनीतिक खींचतान से ऊपर था, जहाँ तीसरे देशों को लेकर मतभेद होने के बावजूद bilateral relationship को नुकसान नहीं पहुँचने दिया जाता था। अब वह संतुलन टूटता दिख रहा है, और इसकी कीमत दोनों देशों को चुकानी पड़ेगी — लेकिन भारत को ज़्यादा नहीं, बल्कि अमेरिका को, क्योंकि एक rising India को alienate करना long-term में America के Indo-Pacific strategy के लिए घातक होगा।
भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी economy है, 2047 तक Viksit Bharat का लक्ष्य है, और global supply chains में एक irreplaceable player बन रहा है। ऐसे में भारत को चीन के साथ एक ही bracket में रखना — जैसा यह कानून करता है — न सिर्फ factually गलत है, बल्कि strategically भी बेवकूफी है। भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से engage करता है, और यही उसकी ताकत है — यह कोई कमज़ोरी नहीं जिसे अमेरिकी tariff की धमकी से तोड़ा जा सके।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नज़रें राष्ट्रपति ट्रंप पर हैं — क्या वे इस बिल पर sign करेंगे? ट्रंप का भारत के प्रति रुख पहले से mixed रहा है — एक तरफ PM मोदी के साथ personal chemistry, दूसरी तरफ tariff को लेकर aggressive posturing। अगर यह कानून बनता है, तो भारत के सामने एक कठिन diplomatic challenge होगा, लेकिन यह भी तय है कि भारत झुकेगा नहीं। New Delhi का track record यही कहता है — चाहे वह Cold War का दौर हो, 1998 के nuclear tests के बाद के sanctions हों, या आज का यह नया दबाव। भारत ने हमेशा अपनी strategic autonomy को बचाया है, और इस बार भी बचाएगा। यह वक्त है कि भारत अपनी energy diversification को और तेज़ करे, domestic refining capacity बढ़ाए, और diplomatic channels के ज़रिए Washington को यह message साफ दे — Bharat झुकता नहीं, बात करता है।

