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ममता का U-Turn: कांग्रेस की शरण में तृणमूल — राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई या नई रणनीति?

ममता का U-Turn: कांग्रेस की शरण में तृणमूल — राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई या नई रणनीति?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव आया है। जो ममता बनर्जी कभी I.N.D.I.A गठबंधन से दूरी बनाकर अकेले चुनाव लड़ने पर अड़ी रहती थीं, वही अब कांग्रेस को अपनी “बहन पार्टी” और “स्वाभाविक सहयोगी” बता रही हैं। यह महज़ एक tactical shift नहीं है — यह एक ऐसी नेता का राजनीतिक survival mode है, जो सत्ता खोने के बाद अपने ही खेमे में बगावत झेल रही है।

थीसिस साफ है: ममता बनर्जी का कांग्रेस की तरफ झुकाव किसी वैचारिक एकता का नतीजा नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व बचाने की मजबूरी है। और यह मजबूरी बंगाल की विपक्षी राजनीति को पूरी तरह नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।

बगावत, बिखराव और बेबसी

सत्ता जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जो टूटन आई है, वो किसी भी पार्टी के लिए घातक होती। रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग तीन-चौथाई विधायकों और सांसदों ने ममता का साथ छोड़ दिया। यह कोई छोटी दरार नहीं — यह पार्टी की बुनियाद में भूकंप है। ऐसे में नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देना ममता की रणनीतिक मजबूरी को दर्शाता है, न कि उनकी ताकत को।

ममता ने खुद कहा — “हम इंडिया गठबंधन में एकजुटता चाहते हैं… नंदीग्राम में हम कांग्रेस पार्टी को अपना समर्थन देंगे। यह देश के बड़े हित में है।” लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक इस बयान को “राष्ट्रहित” से ज़्यादा “आत्मरक्षा” की भाषा में पढ़ रहे हैं।

असम की नागांव लोकसभा सीट पर भी TMC ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है। यह संकेत है कि ममता अब बंगाल से बाहर भी गठबंधन की ज़मीन तलाश रही हैं — क्योंकि अकेले लड़ने की हैसियत अब उनके पास नहीं रही।

BJP पर निशाना, लेकिन असली लड़ाई भीतर से

ममता ने चुनाव आयोग के एक फैसले को “असंवैधानिक” और “लोकतंत्र का काला दिन” करार दिया। उन्होंने BJP पर विपक्षी दलों को खत्म करने की साज़िश का आरोप लगाया। TMC के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने भी कहा कि केंद्र ने चुनाव आयोग का दुरुपयोग किया है और यह राजनीतिक लड़ाई यहीं नहीं रुकेगी।

लेकिन इन बयानों के पीछे की सच्चाई यह है कि ममता की असली लड़ाई बाहर से नहीं, भीतर से है। 15 साल के शासन के दौरान कांग्रेस और TMC के रिश्ते इतने कड़वे हो गए थे कि दोनों एक मंच पर खड़े होना तक गवारा नहीं करते थे। आज वही दोनों पार्टियां एक-दूसरे की “स्वाभाविक सहयोगी” बन रही हैं — क्योंकि दोनों का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर है।

विश्लेषकों की राय में यह गठबंधन किसी एक पार्टी की ताकत नहीं, बल्कि दोनों की कमज़ोरी का उत्पाद है। BJP-विरोधी वोटों का बिखराव रोकना दोनों की ज़रूरत है — और यही ज़रूरत उन्हें एक मेज़ पर ला रही है। बंगाल की राजनीति में यह नया समीकरण कितना टिकाऊ होगा, यह तो वक्त बताएगा — लेकिन इतना तय है कि यह “दिल से दोस्ती” नहीं, “मजबूरी का मेल” है।

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