लेखक: शंकर शरण | SDNewsWire Opinion
भारत की असली समस्या यह नहीं है कि उसके पास पर्याप्त मिसाइलें नहीं हैं या उसकी सेना कमज़ोर है। असली समस्या यह है कि दशकों से भारतीय नेतृत्व एक बुनियादी वैचारिक भूल करता आया है — जिहाद को ‘आतंकवाद’ का लेबल लगाकर उसकी वैचारिक जड़ों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना। यही एक गलती है जो बाकी सभी नीतिगत विफलताओं की जननी है, और जब तक इसे स्वीकार नहीं किया जाता, ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाइयाँ भी केवल अस्थायी राहत बनकर रह जाएंगी।
पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में पर्यटकों से उनका मज़हब पूछकर की गई हत्याओं के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया। उन हमलावरों में पाकिस्तानी और भारतीय — दोनों शामिल थे। लेकिन उन भारतीय जिहादियों का क्या हुआ, यह सार्वजनिक रूप से कभी स्पष्ट नहीं किया गया। और इसी अनुत्तरित प्रश्न का परिणाम हाल ही में कुलगाम में दिखा, जहाँ फिर मज़हब पूछकर दो हिंदू मज़दूरों की हत्या कर दी गई। यह कोई संयोग नहीं है — यह उसी मतवाद की अगली कड़ी है जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई। जब तक जिहाद के विचार पर सीधी वैचारिक चोट नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएँ दोहराती रहेंगी।
भारतीय नेताओं ने चार दशकों में ‘निष्पक्ष चुनाव’, ‘कश्मीरियत’, ‘हीलिंग टच’ और ‘विकास’ जैसे नारों की आड़ में असली समस्या से मुँह फेरे रखा। इससे भी विचित्र यह है कि जिन क्षेत्रों से लाखों हिंदुओं को चुन-चुनकर मार भगाया गया, उन्हीं क्षेत्रों को राष्ट्रीय कोष से विशेष विकास पैकेज दिए गए। जिन मोहल्लों और गाँवों से हिंदुओं की संपत्ति, खेत और घर छीने गए, वहाँ ‘आतंक छोड़ने वालों को रोज़गार’ देने की नीति बनाई गई। यह नीति न केवल न्याय का उपहास है, बल्कि यह जिहादी ठिकानों को अप्रत्यक्ष रूप से पुरस्कृत करना है। अंग्रेज़ शासक इसके उलट करते थे — बार-बार हिंसा करने वाले क्षेत्रों पर सामूहिक जुर्माना लगाते थे, ताकि स्थानीय समाज में अपराध रोकने की प्रेरणा जागे। उस नीति के परिणाम भी आते थे।
विचार को तोप से नहीं मारा जा सकता
अमेरिका और यूरोप ने पाकिस्तान सहित दर्जनों देशों में सैकड़ों ‘आतंकी ठिकानों’ पर लाखों बम बरसाए। ओसामा बिन लादेन मारा गया। नतीजा क्या निकला? एक दिल्ली के मौलाना ने खुलकर कहा था — “एक ओसामा मरेगा तो सौ पैदा होंगे।” वे गलत नहीं थे। ओसामा के बाद कश्मीर से केरल तक छोटे-छोटे ओसामाओं ने काफिरों को निशाना बनाना जारी रखा। इसलिए नहीं कि उनके पास ज़्यादा हथियार थे, बल्कि इसलिए कि उनके पास एक विचार था — और विचार मिसाइलों से नहीं मरते। जिहाद एक मतवादी मिशन है जो दर्जनों शांतिपूर्ण और हिंसक तरीकों से एक साथ काम करता है। उसकी नज़र हमेशा नतीजे पर होती है, तरीके पर नहीं।
यही कारण है कि जिहाद को ‘टेररिज्म’ कहना न केवल बौद्धिक रूप से गलत है, बल्कि रणनीतिक रूप से आत्मघाती भी है। जब आप किसी बीमारी को गलत नाम देते हैं, तो इलाज भी गलत होता है और मरीज़ बदतर होता जाता है। भारत के बुद्धिजीवी और नेता जिहाद को ‘आतंक’ कहकर उसकी वैचारिक शक्ति को अदृश्य कर देते हैं। इसी वजह से आम हिंदू जिहाद को देख नहीं पाता, समझ नहीं पाता। और इसी वजह से जिहाद इंच-इंच, बस्ती-बस्ती, मोहल्ला-मोहल्ला आगे बढ़ता रहता है — अक्सर बिल्कुल शांतिपूर्वक, और कभी-कभी तो काफिरों की मदद से ही।
भारत के पास जनसंख्या है, सेना है, धन है, तकनीक है — फिर भी बंगाल, कश्मीर, केरल और असम में हिंदू गाँव खाली होते जा रहे हैं। यह कमज़ोरी सैन्य नहीं, वैचारिक है। जब तक भारत का नेतृत्व जिहाद को उसके असली नाम से पुकारने का साहस नहीं दिखाता, तब तक हर ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक नया पहलगाम और एक नया कुलगाम तैयार होता रहेगा। यह Bharat का सबसे ज़रूरी ideological battle है — और इसे लड़ने के लिए मिसाइल नहीं, स्पष्ट नज़र और अटूट मनोबल चाहिए।
(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

