संसद का मानसून सत्र एक बार फिर हंगामे की भेंट चढ़ गया है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है — आखिर कब तक देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था को इस तरह बंधक बनाया जाता रहेगा? भाजपा ने मंगलवार को पार्टी मुख्यालय से इस सवाल का जवाब सीधे और बेबाक अंदाज में दिया — और निशाने पर थे कांग्रेस और उनके INDI गठबंधन के साथी।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और लोकसभा सदस्य संबित पात्रा ने प्रेसवार्ता में कहा कि विपक्ष सुनियोजित तरीके से संसद की कार्यवाही को बाधित कर रहा है। यह कोई spontaneous आक्रोश नहीं है — यह एक calculated strategy है, जिसका मकसद सरकार को घेरना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को ही कमज़ोर करना है।
हर संसदीय सत्र पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं — taxpayers का पैसा, आम भारतीय की गाढ़ी कमाई। यह पैसा इसलिए लगाया जाता है ताकि देश के कोने-कोने से चुनकर आए जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्रों की आवाज़ उठा सकें। लेकिन जब प्रश्नकाल और शून्यकाल दोनों ही हंगामे की बलि चढ़ जाएं, तो सांसदों का वह अधिकार भी छिन जाता है जो संविधान ने उन्हें दिया है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गतिरोध के कारण देशहित से जुड़े अहम विधेयक बिना पर्याप्त बहस के पास होने की स्थिति में आ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट नंबर ऑफ जजेस (संशोधन) बिल और रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ एंड डेथ (संशोधन) बिल जैसे महत्वपूर्ण विधायी सुधार — जो सीधे आम जनता की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं — बिना सार्थक चर्चा के पास हो रहे हैं। और इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? उन्हीं की, जो खुद को “विपक्ष की आवाज़” कहते हैं।
भाजपा ने कांग्रेस पर ‘चुनिंदा आक्रोश’ का भी तीखा आरोप लगाया। संबित पात्रा ने साफ कहा — जब झारखंड और कर्नाटक जैसे कांग्रेस-शासित राज्यों में पेपर लीक और भर्ती घोटाले होते हैं, तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी के नेता एकदम चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन जहां राजनीतिक रोटियां सेकने का मौका हो, वहां वही मुद्दे उठाकर हंगामा किया जाता है। यह दोहरा मापदंड अब देश की जनता समझ चुकी है — especially वो GenZ voters जो social media पर हर hypocrisy को real-time में track करते हैं।
और फिर आई वो घटना जिसने धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई। संसद परिसर में राम मंदिर के दान को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन में एक व्यक्ति को साधु के वेश में चोर के रूप में चित्रित करके घसीटा गया। पात्रा ने इसे देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक संस्थान और संत समाज दोनों का अपमान करार दिया। राम मंदिर — जो सदियों के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है — उससे जुड़े संतों का इस तरह अपमान करना किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है।
सच यह है कि INDI गठबंधन के पास न कोई ठोस एजेंडा है, न कोई विकल्प। उनकी रणनीति सिर्फ disruption है — संसद को चलने से रोको, सरकार को काम करने से रोको, और फिर मीडिया में शोर मचाओ। लेकिन भारत की जनता — जो 2024 में भी मोदी सरकार पर भरोसा जता चुकी है — इस खेल को बखूबी पहचानती है।
लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं चलता। लोकतंत्र तब मज़बूत होता है जब संसद में बहस हो, सवाल हों, जवाब हों — और हर आवाज़ सुनी जाए। जो विपक्ष संसद को ही ठप कर दे, वो लोकतंत्र का रक्षक नहीं, उसका सबसे बड़ा दुश्मन है।
(PTI इनपुट के साथ)

