जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माँ के खिलाफ जो भाषा इस्तेमाल की गई, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है — यह बात BJP सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने बिना किसी लाग-लपेट के कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार सबको है, लेकिन जब विरोध की भाषा गरिमा की सीमा लाँघ जाए और किसी के दिवंगत परिजनों को निशाना बनाया जाए, तो वह असहमति नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का प्रतीक बन जाती है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक छात्र आंदोलन के दौरान 75 वर्षीय प्रधानमंत्री मोदी को लेकर अत्यंत आपत्तिजनक और व्यक्तिगत टिप्पणियाँ सामने आईं। इन टिप्पणियों में PM की दिवंगत माँ हीराबेन को भी निशाना बनाया गया, जो देश के करोड़ों लोगों की आस्था और भावनाओं से जुड़ा मामला बन गया। कंगना ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आंदोलन में शामिल लोग यदि खुद को छात्र कहते हैं, तो उनकी भाषा और व्यवहार उस पहचान के साथ कतई मेल नहीं खाते।
कंगना ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने भी अपने समय में छात्र आंदोलनों में हिस्सा लिया, लेकिन इस स्तर की अश्लील भाषा और व्यक्तिगत हमले कभी नहीं देखे। उनके मुताबिक, किसी भी आंदोलन की असली पहचान उसके मुद्दों और उसकी मर्यादा से होती है — गाली-गलौज से नहीं। यह बात उन्होंने सीधे और बिना किसी diplomatic hedging के कही, जो उनकी political communication style का हिस्सा रही है।
इसके बाद कंगना ने उन युवाओं के भविष्य को लेकर एक व्यावहारिक सवाल उठाया — अगर इन लोगों को कल Supreme Court के वकीलों की जरूरत पड़ी, तो क्या इनके माता-पिता वह खर्च उठा पाएंगे? उन्होंने कहा कि अधिकांश युवाओं के पास इतने संसाधन नहीं होते, इसलिए जोश के साथ-साथ होश भी जरूरी है। यह टिप्पणी सिर्फ चेतावनी नहीं थी, बल्कि एक ऐसी reality check थी जो GenZ को सोचने पर मजबूर करती है।
फिर कंगना ने वह बात कही जो उनके पूरे बयान की रीढ़ बनी — “मैंने 16 साल की उम्र से अपना करियर बनाना शुरू किया और कभी अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनी।” यह आत्मनिर्भरता का वह संदेश था जो भारत के युवाओं को आज सबसे ज़्यादा चाहिए। उन्होंने कहा कि ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाना और अपने जीवन को बेहतर बनाना ही असली युवा पहचान होनी चाहिए — न कि सड़कों पर अभद्रता फैलाना।
अंत में कंगना ने एक बड़ी बात कही जो पूरे मामले को उसके सही परिप्रेक्ष्य में रखती है — लोकतंत्र में असहमति पवित्र है, लेकिन जब विरोध की भाषा अपनी गरिमा खो दे, तो वह समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरे की घंटी बन जाती है। एक समाज के तौर पर हमें यह तय करना होगा कि हम किस तरह के discourse को normalize करना चाहते हैं। PM मोदी की माँ हीराबेन का जीवन सादगी और संघर्ष का प्रतीक था — उनके नाम पर की गई कोई भी अभद्र टिप्पणी सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि उस भारत का अपमान है जो अपनी माताओं को देवी मानता है।

