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कारगिल का सच: नवाज शरीफ की सीढ़ी, मुशर्रफ का खेल — ऑपरेशन बद्र की पूरी कहानी

कारगिल का सच: नवाज शरीफ की सीढ़ी, मुशर्रफ का खेल — ऑपरेशन बद्र की पूरी कहानी

वो साजिश जो 1998 में शुरू हुई थी

कारगिल युद्ध सिर्फ एक सैन्य संघर्ष नहीं था — यह पाकिस्तान की सोची-समझी, सुनियोजित और बेहद गोपनीय षड्यंत्र का परिणाम था, जिसकी नींव अगस्त 1998 में ही रख दी गई थी। और इस पूरे खेल के केंद्र में थे दो नाम — तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके द्वारा बनाए गए आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ।

कारगिल युद्ध के पाँच साल बाद नवाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से कहा कि मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाना उनकी सबसे बड़ी भूल थी, और यह भी कि उन्हें ऑपरेशन बद्र — कारगिल हमले का आधिकारिक कोड नेम — के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन दस्तावेज़, खुफिया रिपोर्टें और जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयान करती हैं। यह deep-dive उसी कहानी को उघाड़ता है।

शरीफ ने बिछाई वो बिसात, जिस पर मुशर्रफ ने चाल चली

दस्तावेज़ों के अनुसार, नवाज शरीफ ने परवेज मुशर्रफ के साथ मिलकर अगस्त 1998 से ही ऑपरेशन बद्र की रणनीतिक तैयारी शुरू कर दी थी। इस योजना का पहला कदम था — मुशर्रफ को पाकिस्तान का आर्मी चीफ बनाना, और इसके लिए शरीफ ने जो हथकंडे अपनाए, वे किसी लोकतांत्रिक नेता के नहीं, बल्कि एक षड्यंत्रकारी के थे।

करामत को हटाने की चाल

उस समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल जहांगीर करामत थे, जो कुछ ही महीनों में सेवानिवृत्त होने वाले थे। करामत नहीं चाहते थे कि परवेज मुशर्रफ — जो वरीयता में तीसरे नंबर पर थे — अगले आर्मी चीफ बनें। नवाज शरीफ ने करामत की सार्वजनिक आलोचना शुरू की, इतनी तीखी और अपमानजनक कि आहत करामत ने रिटायरमेंट से पहले ही इस्तीफा दे दिया। रास्ता साफ हो गया।

दो वरिष्ठ अधिकारियों को किया दरकिनार

करामत के जाते ही शरीफ ने वरीयता क्रम को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए दो वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को दरकिनार कर परवेज मुशर्रफ को पाकिस्तान का सेना प्रमुख नियुक्त कर दिया। यह कोई प्रशासनिक निर्णय नहीं था — यह एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था।

ऑपरेशन बद्र: कारगिल हमले की असली ब्लूप्रिंट

आर्मी चीफ बनते ही मुशर्रफ ने तेज़ी से अपने मोहरे बिठाने शुरू किए। ये बदलाव महज प्रशासनिक फेरबदल नहीं थे — ये एक बड़ी सैन्य साजिश के संकेत थे।

नवाज शरीफ: अनजान या शामिल?

यही वो सवाल है जो कारगिल की हर चर्चा के केंद्र में रहता है। नवाज शरीफ ने बार-बार कहा कि उन्हें कारगिल ऑपरेशन की जानकारी नहीं थी, और यह कि उन्हें पाकिस्तानी सेना की संलिप्तता का पता तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के फोन से चला। लेकिन तथ्य इस दावे को खोखला साबित करते हैं।

दो बार दी गई थी जानकारी

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार नवाज शरीफ को दिसंबर 1998 या जनवरी 1999 में पहली बार कारगिल हमले की योजना के बारे में बताया गया था। मार्च 1999 में उन्हें दोबारा ब्रीफ किया गया। मुशर्रफ और उनके चीफ ऑफ स्टाफ आजिज खान के बीच हुई गोपनीय बातचीत के अवरोधित अंश भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

लाहौर घोषणा के बाद भारत-विरोधी जहर

फरवरी 1999 में वाजपेयी जी की ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा के बाद शांति की उम्मीद जगी थी। लेकिन अप्रैल 1999 में — जब कारगिल में पाक सेना अपनी चौकियाँ मजबूत कर रही थी — नवाज शरीफ के मंत्रियों ने भारत के खिलाफ तीखे बयान देने शुरू कर दिए। भारत के अग्नि-2 मिसाइल परीक्षण के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री सरताज आजिज और सीनेटर अक्रम जाकी ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए। यह माहौल बनाना था — ताकि भारत की नजर असली खतरे से हट जाए।

सिख अलगाववादियों से मुलाकात: भारत को गुमराह करने की चाल

13 अप्रैल 1999 को बैसाखी समारोह की आड़ में नवाज शरीफ ने सिख अलगाववादियों से विशेष मुलाकात की। इसके लिए उन्होंने आईएसआई के पूर्व चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नासिर को पाकिस्तानी गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का प्रमुख नियुक्त किया था। मकसद साफ था — भारत को यह संदेश देना कि पाकिस्तान पंजाब में आतंकवाद को फिर से हवा देने की तैयारी में है, ताकि भारतीय सुरक्षा बल कारगिल से ध्यान हटाकर पंजाब सीमा पर केंद्रित हो जाएँ।

मुशर्रफ को दी गई थीं स्पेशल पावर्स

कारगिल युद्ध से कुछ महीने पहले नवाज शरीफ ने मुशर्रफ को ज्वाइंट चीफ कमेटी का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया, जिससे उन्हें स्ट्रैटेजिक फोर्स कमांडर तैनात करने की शक्ति मिल गई। इसके तुरंत बाद मुशर्रफ ने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व में व्यापक फेरबदल किया। यह सब संयोग नहीं था।

चीन और अमेरिका की यात्रा: कूटनीतिक दाँव

जब कारगिल में भारतीय सेना ने पलटवार शुरू किया और बाज़ी पलटने लगी, तब नवाज शरीफ ने चीन और अमेरिका का दौरा किया। उन्होंने राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से भारत पर दबाव डालने की अपील की, ताकि पाकिस्तान की शर्तों पर युद्धविराम हो। यहाँ तक कि उन्होंने क्लिंटन से कहा कि अगर उनकी बात नहीं मानी गई, तो पाकिस्तान लौटने पर उनकी जान खतरे में पड़ जाएगी। यह कोई बेबस नेता का बयान नहीं था — यह एक ऐसे शख्स की चाल थी जो जानता था कि दाँव उसी ने लगाया है।

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