10 मई 1857 — जब मेरठ से उठी आज़ादी की पहली चिंगारी
पटना: बिहार सरकार के ग्रामीण विकास एवं सूचना मंत्री श्रवण कुमार ने 10 मई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वर्षगांठ पर देश के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। जदयू विधायक दल के नेता श्रवण कुमार ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा कि 1857 का यह महासमर केवल एक सिपाही विद्रोह नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला देने वाला सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम था।
मेरठ से उठी वो ज्वाला जो पूरे हिंदुस्तान में फैल गई
मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि 10 मई 1857 की तारीख भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन मेरठ से सशस्त्र क्रांति का शंखनाद हुआ, जिसे इतिहास ‘आज़ादी की पहली लड़ाई’ के नाम से जानता है।
मेरठ से उठी यह चिंगारी देखते-देखते बरेली, झांसी, अवध और दिल्ली तक फैल गई। क्रांतिकारियों ने दिल्ली पहुंचकर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित कर दिया — यह एकता का वह प्रतीक था जिसने अंग्रेज़ों को हिला दिया।
कोतवाल धन सिंह गुर्जर — वो जांबाज़ जिसने जेल की दीवारें तोड़ दीं
मंत्री ने इस क्रांति के नायक कोतवाल धन सिंह गुर्जर और उनके साथियों की वीरता को विशेष रूप से याद किया। उनकी दिलेरी की गाथा आज भी रोंगटे खड़े कर देती है:
गुलामी की जंजीरें तोड़ने का पहला संकल्प
श्रवण कुमार ने अपने बयान में कहा कि 1857 का यह महासमर भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया पहला सुनियोजित युद्ध था। अंग्रेज़ों ने इसे दबाने की पूरी कोशिश की, लेकिन इस संघर्ष की ज्वाला कभी शांत नहीं हुई।
इसी संघर्ष ने भविष्य के स्वतंत्रता आंदोलनों — गांधी, भगत सिंह, सुभाष — सबके लिए मार्ग प्रशस्त किया। मंत्री ने नई पीढ़ी से इन वीरों की शहादत और उनके बलिदान से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।
Bharat Mata Ki Jai — याद रखो उन वीरों को जिन्होंने पहले लड़ाई लड़ी
1857 का यह संग्राम सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, हर भारतीय के DNA में दर्ज है। धन सिंह गुर्जर जैसे नायकों को भुला देना उस कुर्बानी का अपमान होगा जिसकी बुनियाद पर आज का स्वतंत्र भारत खड़ा है।

