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NEET पेपर लीक विवाद: वांगचुक का अनशन टूटा, Fast-Track Court बना — 34 दिनों में PM मोदी ने कैसे बदला पूरा ‘गेम’?

NEET पेपर लीक विवाद: वांगचुक का अनशन टूटा, Fast-Track Court बना — 34 दिनों में PM मोदी ने कैसे बदला पूरा 'गेम'?

NEET-UG 2026 पेपर लीक कांड ने देश के करोड़ों छात्रों के सपनों पर जो चोट की, उसकी आंच अब दिल्ली के जंतर-मंतर से निकलकर पूरे राष्ट्र को महसूस हो रही है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन गुरुवार को अपने 34वें दिन में प्रवेश कर चुका था, लेकिन उसी रात PM नरेंद्र मोदी ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरे आंदोलन का ‘भूगोल’ ही बदल दिया — उन्होंने पहली बार सेल्फी मोड में वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर जारी किया, जिसमें उन्होंने पेपर लीक के दोषियों के खिलाफ फास्ट-ट्रैक कोर्ट के गठन और संसद में नया कानून लाने का ऐलान किया। यह सिर्फ एक घोषणा नहीं थी — यह एक रणनीतिक चाल थी जिसने छात्रों के गुस्से को सहानुभूति में बदलने की कोशिश की।

PM मोदी ने अपने X हैंडल पर लिखा: “देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द कठोर दंड देने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा, और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। इस घोषणा के कुछ ही घंटों बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी एक्शन लिया और राउज एवेन्यू कोर्ट में ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024’ के तहत मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन कर दिया। जज अनु ग्रोवर बालिगा को इस नवनिर्मित अदालत में विशेष न्यायाधीश (CBI/PC Act) के रूप में स्थानांतरित किया गया, और NEET-UG से जुड़े सभी लंबित मामले तुरंत इस कोर्ट में ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए।

PM के वीडियो मैसेज के बाद केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल पहुंचे, जहां सोनम वांगचुक भर्ती थे। दोनों मंत्रियों ने उन्हें सरकार के प्रयासों की जानकारी देते हुए अनशन समाप्त करने का आग्रह किया। वांगचुक ने सूप पीकर अपना अनशन तोड़ दिया — यह एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक क्षण था जो बताता है कि सरकार की नरम-गरम नीति ने कम से कम एक मोर्चे पर काम किया। हालांकि, जंतर-मंतर पर CJP का प्रदर्शन अभी भी जारी है, और संगठन ने 24 जुलाई को देशव्यापी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है, जिसमें शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुख है।

सरकार की रणनीति दो-आयामी है — एक तरफ सहानुभूति और संवाद, दूसरी तरफ कड़ी सुरक्षा। जंतर-मंतर के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद कर दिया गया, 17 प्रमुख मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए, और दिल्ली में पैरा-मिलिट्री फोर्स की तैनाती बढ़ाई गई। जो मेट्रो स्टेशन शुक्रवार सुबह 7:30 बजे से बंद रहे, उनमें शामिल हैं

बातचीत के मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने छात्र प्रतिनिधियों को चार औपचारिक प्रस्ताव भेजे हैं और वह जेपी नड्डा के कार्यालय या आवास पर किसी भी समय चर्चा के लिए तैयार है। लेकिन CJP के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि उन्हें अभी तक कोई सीधा या आधिकारिक संदेश नहीं मिला है, और यदि बातचीत होनी है तो वह जंतर-मंतर या ‘कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया’ जैसे किसी तटस्थ स्थान पर होनी चाहिए। यह गतिरोध बताता है कि संवाद की राह अभी पूरी तरह खुली नहीं है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू है विपक्ष की भूमिका। AAP नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज देर रात जंतर-मंतर पहुंचे और प्रदर्शनकारियों का हौसला बढ़ाया। भारद्वाज ने साफ कहा कि सरकार से बातचीत की कोई जरूरत नहीं, बस शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लो। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस, सपा और AAP — तीनों दल इस आंदोलन को एक बड़े राष्ट्रव्यापी राजनीतिक स्वरूप में बदलना चाहते हैं, और नेपाल-बांग्लादेश की तर्ज पर Gen-Z आंदोलन को हवा देने की उनकी मंशा किसी से छुपी नहीं है। यह राजनीतिक opportunism है, और इसे उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।

असली सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार की यह दो-आयामी रणनीति — फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन, नए कानून का वादा, और सुरक्षा की कड़ाई — आंदोलन को शांत कर पाएगी? सरकार का संदेश स्पष्ट है: वह देश के करोड़ों छात्रों के साथ है, पेपर माफिया को बख्शेगी नहीं, लेकिन हिंसा और अराजकता को भी बर्दाश्त नहीं करेगी। भारत के युवाओं का भविष्य किसी पार्टी की राजनीति का मोहरा नहीं बन सकता — और अगर सरकार इस संदेश को जमीन पर उतारने में सफल रही, तो यह 34 दिनों का प्रदर्शन इतिहास में एक turning point के रूप में दर्ज होगा। आगे क्या होगा, यह आने वाले दिन तय करेंगे।

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