महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर महायुति गठबंधन ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया है — और इस बार मैदान था ठाणे जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक का चुनाव, जिसे राज्य की सहकारिता राजनीति की रीढ़ माना जाता है। यह कोई साधारण बैंक नहीं है। यह वह संस्था है जिसके ज़रिए महाराष्ट्र के किसानों, महिलाओं और युवाओं तक वित्तीय शक्ति पहुँचती है — और अब यह शक्ति महायुति के हाथों में आ गई है।
हाल ही में घोषित चुनाव परिणामों के अनुसार, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और महाराष्ट्र भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण की सुनियोजित रणनीति के तहत महायुति समर्थित उम्मीदवारों ने कुल 21 सीटों में से 13 पर जीत दर्ज की। बहुमत के लिए केवल 11 सीटों की ज़रूरत थी — और महायुति ने उससे दो आगे निकलकर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली। भाजपा के 8 और शिंदे गुट के 5 उम्मीदवारों की जीत के साथ बैंक की सत्ता पर महायुति का नियंत्रण अब लगभग अटल हो गया है।
इस जीत की असली कहानी रणनीति में छुपी है। ठाणे जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक पर पिछले कई वर्षों से हितेंद्र ठाकूर के नेतृत्व वाली बहुजन विकास आघाड़ी का दबदबा रहा है। इस किले को भेदने के लिए महायुति ने एक चतुर दोहरी पैनल रणनीति अपनाई — केंद्र और राज्य में सहयोगी होने के बावजूद भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के उम्मीदवार अलग-अलग पैनलों से मैदान में उतरे। इसका मकसद था अधिक से अधिक इच्छुक कार्यकर्ताओं को मौका देना और हर वर्ग के मतदाता तक पहुँच बनाना।
‘सहकार पैनल’ में विधायक किसन कथोरे के नेतृत्व में भाजपा और शिंदे गुट के उम्मीदवार एकजुट हुए, जबकि ‘परिवर्तन पैनल’ में भी दोनों दलों के कुछ उम्मीदवार थे। अंत में सहकार पैनल ने परिवर्तन पैनल को करारी शिकस्त देते हुए बहुमत हासिल किया। यह जीत सिर्फ सीटों की गिनती नहीं है — यह महायुति की ज़मीनी पकड़ और संगठनात्मक अनुशासन का प्रमाण है।
जीत के बाद सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि यह बैंक महिलाओं, युवाओं और किसानों के कल्याण के लिए काम करती रही है, और अब सभी संचालक मिलकर इसे 24 हज़ार करोड़ की बैंक बनाने का सपना पूरा करेंगे। उन्होंने सभी विजयी संचालकों को बधाई दी। यह बयान सिर्फ जश्न नहीं — यह एक दृष्टिकोण है, एक agenda है जो सहकारिता को growth engine के रूप में देखता है।
अब राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बैंक के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों की कुर्सी किसे मिलेगी। माना जा रहा है कि यह फैसला महायुति के वरिष्ठ नेतृत्व के स्तर पर होगा — और आने वाले दिनों में तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन एक बात अभी से साफ है: सहकारिता की राजनीति में भी महायुति ने अपना झंडा गाड़ दिया है। विधानसभा से लेकर सहकारी बैंक तक — महाराष्ट्र में महायुति की लहर थमने का नाम नहीं ले रही।

