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कानूनों का दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और न्याय व्यवस्था का संकट

कानूनों का दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और न्याय व्यवस्था का संकट

झूठे मुकदमे और कानूनों का दुरुपयोग — अब बदलाव जरूरी है

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक गंभीर चेतावनी दी है — वैवाहिक और व्यावसायिक विवादों में कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए नहीं, बल्कि प्रतिशोध और दबाव के हथियार के रूप में हो रहा है। यह सिर्फ न्याय व्यवस्था का नहीं, पूरे समाज का संकट है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कई मामलों में पक्षकार “अनैतिक और कुटिल उपायों” का सहारा लेकर एक-दूसरे के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण आपराधिक शिकायतें दर्ज कराते हैं। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में कानून और पुलिस का उपयोग न्याय के लिए नहीं, बल्कि परिवारों को परेशान करने और प्रतिशोध लेने के लिए किया जा रहा है।

दहेज और घरेलू हिंसा कानूनों का दुरुपयोग

दहेज उत्पीड़न, वैवाहिक क्रूरता और घरेलू हिंसा जैसे कानूनों के तहत दर्ज अनेक मामले न्यायिक परीक्षण में साबित नहीं हो पाए। कई बार अस्पष्ट और व्यापक आरोपों के आधार पर पूरे परिवार को वर्षों तक मुकदमेबाजी में घसीटा जाता है।

पुरुषों की पीड़ा — जो विमर्श से गायब है

22 जनवरी 2025 को ‘ज्योति उर्फ किट्टू बनाम राज्य’ मामले में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि यह मानना गलत है कि वैवाहिक विवादों में केवल महिलाएं ही क्रूरता की शिकार होती हैं। उन्होंने साफ कहा — “जिस प्रकार महिलाएं संरक्षण की अधिकारिणी हैं, उसी प्रकार पुरुष भी विधि के अंतर्गत समान सुरक्षा के अधिकारी हैं।”

झूठे आरोपों से पीड़ित पुरुषों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक तकलीफें आज भी सामाजिक और कानूनी विमर्श से बाहर हैं — यही सबसे बड़ी विडंबना है।

केरल हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

गत वर्ष केरल उच्च न्यायालय ने भी माना कि बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह पुरानी धारणा कि आरोप लगाने मात्र से उसकी सत्यता सिद्ध हो जाती है, अब मान्य नहीं रह सकती। अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में गंभीर आरोप प्रतिशोध, दबाव या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से भी लगाए गए हैं।

किसी भी आरोप की सत्यता का निर्धारण पूर्वधारणाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों की कसौटी पर होना चाहिए।

अधिकार और जवाबदेही — दोनों जरूरी

लोकतंत्र में अधिकारों का संरक्षण अनिवार्य है, लेकिन अधिकार के साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। जब कानून संरक्षण की बजाय प्रतिशोध का हथियार बन जाए, तो वह पूरी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।

महिलाओं के खिलाफ वास्तविक हिंसा और उत्पीड़न से लड़ना जरूरी है — लेकिन एक समस्या का समाधान दूसरी समस्या की उपेक्षा करके नहीं होगा। दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।

Bottom Line

कानूनों का दुरुपयोग रोकना, झूठे मुकदमों पर जवाबदेही तय करना और न्याय व्यवस्था को निष्पक्ष एवं विश्वसनीय बनाए रखना — यही आज के भारत की सबसे बड़ी जरूरत है। देर हो चुकी है, अब बदलाव होना ही चाहिए।

(यह लेख डॉ. ऋतु सारस्वत के विचारों पर आधारित है, जो समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं।)

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