पाकिस्तान एक बार फिर अपनी ही जमीन बेचने पर उतारू है — और इस बार निशाने पर है खैबर पख्तूनख्वा का खनिज-समृद्ध इलाका।
खबरें जो सामने आ रही हैं, वो पाकिस्तानी राज्य की संप्रभुता पर सीधा सवाल खड़ा करती हैं। CNN News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पाकिस्तान के खनिज संसाधनों के दोहन का ऑफर पहले ही दे दिया था — और उसके बाद, 11 अक्टूबर को, खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लागू कर दिया गया। यह महज संयोग नहीं लगता।
पूरे घटनाक्रम की timeline देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। 1 अक्टूबर को — यानी आपातकाल से ठीक दस दिन पहले — अमेरिकी Chargé d’Affaires नताली ए. बेकर ने पाकिस्तान के खनिज क्षेत्र में वाशिंगटन की “गहरी रुचि” का सार्वजनिक ऐलान किया। बेकर ने कहा कि अमेरिकी सरकार पाकिस्तान के खनन उद्योग को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाएगी। फिर 11 अक्टूबर को इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की निर्वाचित प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया गया, मुख्यमंत्री और PTI के वरिष्ठ नेता सोहेल अफरीदी को हिरासत में ले लिया गया, और प्रांत पर सीधा केंद्रीय नियंत्रण स्थापित कर दिया गया।
PTI का आरोप है कि यह सब पाकिस्तानी सेना के इशारे पर हुआ। और उनका तर्क बेबुनियाद नहीं है — क्योंकि PTI की प्रांतीय सरकार अमेरिकी कंपनियों को खैबर पख्तूनख्वा के खनिज संसाधनों के दोहन की अनुमति देने को तैयार नहीं थी। जैसे ही वह सरकार हटाई गई, खैबर पख्तूनख्वा के गवर्नर फैसल करीम कुंडी ने घरेलू और विदेशी कंपनियों को संयुक्त उद्यमों के जरिए प्रांत के खनिज क्षेत्र में निवेश का खुला न्योता दे दिया। कुंडी ने दावा किया कि इससे “राज्य की आय बढ़ेगी और लोगों को रोजगार मिलेगा।” उन्होंने तेल और गैस भंडार के दोहन की भी वकालत की।
पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक बयान यह है कि खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल आतंकवाद को खत्म करने के लिए लगाया गया। लेकिन यह तर्क तब खोखला साबित होता है जब आप देखते हैं कि बलूचिस्तान — जो वास्तव में सशस्त्र विद्रोह की आग में जल रहा है — पर इस्लामाबाद ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया। असली मकसद साफ है: खनिज-संपन्न खैबर पख्तूनख्वा पर नियंत्रण, और उसे अमेरिकी हितों के हवाले करना।
भारत के नजरिए से यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान, जो दशकों से “कश्मीर” और “इस्लामी एकजुटता” का नारा लगाकर अपनी जनता को बहकाता रहा है, आज खुद अपनी संप्रभुता को डॉलर के बदले गिरवी रख रहा है। Establishment Pakistan — यानी सेना और नागरिक नेतृत्व का वह गठजोड़ जो असल में देश चलाता है — ने साबित कर दिया है कि उसे पाकिस्तान की जनता की नहीं, बल्कि अपनी सत्ता की चिंता है। जो देश भारत को “साम्राज्यवाद का एजेंट” कहता था, वही आज अमेरिकी कंपनियों को अपनी जमीन सौंप रहा है।
यह पाकिस्तान का आंतरिक संकट नहीं है — यह एक ऐसे राज्य का पतन है जो अपनी प्राथमिकताएं भूल चुका है। और भारत को इस पूरे खेल को बहुत ध्यान से देखना चाहिए, क्योंकि एक कमजोर, बिकाऊ और अस्थिर पाकिस्तान — जहां अमेरिकी और चीनी हित आपस में टकराते हों — हमारी पश्चिमी सीमा पर एक नई किस्म की अनिश्चितता पैदा करता है।

