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₹200 करोड़ का CSR घोटाला: ED ने 4 राज्यों में मारे छापे, NGO नेटवर्क के जरिए होती थी धोखाधड़ी

₹200 करोड़ का CSR घोटाला: ED ने 4 राज्यों में मारे छापे, NGO नेटवर्क के जरिए होती थी धोखाधड़ी

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने देश में CSR फंडिंग के सबसे बड़े घोटालों में से एक का पर्दाफाश किया है — जिसमें लगभग ₹200 करोड़ की हेराफेरी की गई। यह वही फंड है जो कंपनियां कानूनन समाज की भलाई के लिए खर्च करने को बाध्य हैं, लेकिन यहाँ उसे एक सुनियोजित रैकेट के जरिए वापस अपनी जेब में डाल लिया जाता था।

ED ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-NCR में कुल आठ ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। महाराष्ट्र में पाँच, जबकि बाकी तीन राज्यों में एक-एक स्थान पर कार्रवाई हुई और घोटाले से जुड़े अहम दस्तावेज जब्त किए गए।

कंपनी कानून के तहत हर बड़ी कंपनी को अपने शुद्ध लाभ का दो प्रतिशत सामाजिक कार्यों — यानी CSR — पर खर्च करना अनिवार्य है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी कि कॉर्पोरेट जगत की कमाई का एक हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों तक पहुँचे। लेकिन इस घोटाले ने उसी व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया।

इस रैकेट का तरीका बेहद शातिराना था। पहले NGO या फाउंडेशन बनाए जाते थे, जो खुद को स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा दिखाते थे। कंपनियाँ और PSU उन्हें CSR फंड देती थीं, लेकिन वह पैसा समाज तक पहुँचने की बजाय — अपना कमीशन काटकर — वापस उन्हीं कंपनियों को नकद लौटा दिया जाता था।

इस पूरे नेटवर्क का सूत्रधार मुंबई का धर्मेंद्र कुमार बताया जा रहा है, जो बिना किसी मेडिकल डिग्री के खुद को डॉक्टर बताता था। उसने कई चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाएं खड़ी कीं, जो स्वास्थ्य गतिविधियों की आड़ में निजी कंपनियों के साथ-साथ सरकारी PSU से भी CSR फंड बटोरती थीं।

ED के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार छापेमारी में ट्रस्टों, ट्रस्टियों, बिचौलियों, कमीशन एजेंटों और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं का एक विशाल नेटवर्क सामने आया है। कई मामलों में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा फर्जी या फुलाए हुए बिल पेश किए जाते थे और अतिरिक्त रकम शेल संस्थाओं के जरिए निकाल ली जाती थी।

इस रैकेट में हर स्तर पर कमीशन तय था — दलाल से लेकर बिचौलिए तक, सबका हिस्सा बँधा हुआ था। ED ने अभी जाँच जारी रहने का हवाला देते हुए इसमें शामिल कंपनियों के नाम उजागर करने से इनकार किया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि जाँच का दायरा और बड़ा होगा।

यह मामला सिर्फ वित्तीय धोखाधड़ी नहीं है — यह उन करोड़ों भारतीयों के साथ विश्वासघात है जिनके लिए CSR फंड की व्यवस्था की गई थी। जब तक ऐसे रैकेट पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा।

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