गोवा के एक कांग्रेस कार्यक्रम में उस दिन माहौल सामान्य लग रहा था — मंच पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे बैठे थे, कार्यकर्ता जमा थे, और जब वंदे मातरम् की धुन उठी, तो वो दो छंदों के बाद थम गई। बस यहीं से एक नई सियासी आग भड़क उठी। भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत हमला बोला — यह राष्ट्रगीत का अपमान है, कानून का उल्लंघन है, और इसके लिए तीन साल तक की सजा हो सकती है। खरगे ने पलटकर कहा कि दशकों पुरानी परंपरा का पालन किया गया। लेकिन इस एक घटना ने जो बहस खोली, वो सिर्फ दो छंद बनाम छह छंद की नहीं है — यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा, उसके स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और राष्ट्रीय पहचान को लेकर एक गहरी, 89 साल पुरानी लड़ाई है।
वंदे मातरम् का इतिहास उतना ही समृद्ध है जितना भारत का स्वाधीनता संग्राम। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पहली बार इस गीत को सार्वजनिक मंच मिला, जब स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाकर सुनाया — सभी छह छंदों के साथ। अधिवेशन की अध्यक्षता रहीमतुल्लाह सयानी कर रहे थे, और टैगोर की आवाज में वंदे मातरम् की गूंज ने हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की एक नई लौ जला दी। 1905 के बंग-भंग आंदोलन तक आते-आते यह गीत ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सबसे बड़ा राष्ट्रीय नारा बन चुका था — हर धर्म, हर वर्ग के लोग इसे अपनी जुबान पर लेकर सड़कों पर उतरते थे। उसी वर्ष महात्मा गांधी ने ‘Indian Opinion’ में लिखा था कि वंदे मातरम् का एकमात्र उद्देश्य मन में देशभक्ति की भावना जगाना है — यह भारत को मां मानता है और उसकी स्तुति करता है।
1905 में गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में वंदे मातरम् को आधिकारिक रूप से सभी अखिल भारतीय सभाओं के लिए स्वीकार किया गया, और हर कांग्रेस अधिवेशन की शुरुआत इसी गीत से होने लगी। यह सिलसिला 1937 तक चला — पूरे चालीस साल। फिर अक्टूबर 1937 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में एक निर्णायक मोड़ आया। तय हुआ कि अब केवल दो छंदों का गायन होगा। कांग्रेस ने कहा कि यह फैसला टैगोर की सलाह पर लिया गया, लेकिन असली दबाव कहीं और से आ रहा था।
मुस्लिम नेताओं की आपत्ति यह थी कि वंदे मातरम् के बाद के छंदों में मातृभूमि की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है, जो उनके धार्मिक विश्वास के अनुकूल नहीं। पहले दो छंदों में केवल प्रकृति — हरियाली, नदियां, धरती की सुंदरता — का वर्णन है, इसलिए उन्हें स्वीकार्य माना गया। मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग ने 1937 में वंदे मातरम् के विरुद्ध एक संगठित अभियान छेड़ा था, और उसी दबाव में कांग्रेस ने छंदों की कटौती का फैसला लिया। BJP इसे बार-बार मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति का सबसे पुराना और सबसे स्पष्ट उदाहरण बताती है — और यह आरोप हवाई नहीं है, इतिहास के पन्नों में यह दर्ज है।
आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि वंदे मातरम् ने स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है और इसे ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान दिया जाएगा। उनके इस भाषण पर जोरदार तालियां बजी थीं। संविधान सभा ने दोनों को समान दर्जा दिया, लेकिन कानूनी प्रावधानों में अंतर रखा गया। 1971 में जब राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान के लिए कानून बना, तो ‘जन गण मन’ को उसमें शामिल किया गया — वंदे मातरम् को नहीं। यह अंतर दशकों तक बना रहा, और इसी खाई को पाटने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में कानून में बदलाव किया।
नए कानून के तहत अब वंदे मातरम् को ‘जन गण मन’ के बराबर कानूनी संरक्षण मिल गया है। साथ ही, 1937 में जो छंद हटाए गए थे, उन्हें भी राष्ट्रगीत में पुनः शामिल किया गया है और सभी छह छंदों का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। यह एक ऐतिहासिक सुधार है — भारत की सांस्कृतिक और संवैधानिक विरासत को उसका पूरा हक देने की दिशा में एक ठोस कदम। लेकिन कानून बन जाने के बाद भी प्रतिरोध जारी है। केरल में स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक कार्यक्रम में — जहां सरकारी निर्देश स्पष्ट थे — छह तो क्या, दो छंद का भी गायन नहीं हुआ। यह संयोग नहीं है कि केरल में कांग्रेस की सरकार मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन में है।
यह विवाद सिर्फ गाने के छंदों की गिनती का नहीं है। यह इस बात का है कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर कितना आत्मविश्वासी है — और कौन उस आत्मविश्वास को कमजोर करने की कोशिश में है। वंदे मातरम् बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की कलम से निकला, टैगोर की आवाज में गूंजा, लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के होठों पर रहा, और फांसी के तख्ते तक जाने वाले क्रांतिकारियों का आखिरी उद्घोष बना। उस विरासत को राजनीतिक सुविधा के लिए दो छंदों में समेट देना — यह इतिहास के साथ अन्याय है। नया कानून एक सुधार है, एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है — और अब यह हर भारतीय की जिम्मेदारी है कि वो पूरे वंदे मातरम् को, पूरे गर्व के साथ, गाए।

