तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने एक बड़ा बयान दिया है। कतर-फंडेड मीडिया आउटलेट अल जजीरा को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट — जिसे दुनिया “Islamic NATO” के नाम से जान रही है — में अरब जगत की सबसे ताकतवर सैन्य शक्तियों में से एक, मिस्र, जल्द शामिल हो सकता है। यह समझौता अभी पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच है। एर्दोगन ने यह भी स्पष्ट किया कि यह गठबंधन बाकी देशों के लिए भी खुला है। यानी यह सिर्फ शुरुआत है।
इस समझौते की रीढ़ NATO के Article 5 की तर्ज पर बनाई गई “सामूहिक रक्षा संधि” है। सीधे शब्दों में कहें तो अगर किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा और सभी देश मिलकर उस आक्रामक का सामना करने के लिए बाध्य होंगे। एर्दोगन ने कहा, “इस समझौते ने दुनिया को एक अहम संदेश दिया है।” यह संदेश किसके लिए है, यह समझना मुश्किल नहीं है — और भारत को इसे बहुत गंभीरता से लेना होगा।
मिस्र का इस गठबंधन में संभावित प्रवेश भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका साबित हो सकता है। मिस्र कोई साधारण देश नहीं है — यह अफ्रीका की सबसे शक्तिशाली सेना और मुस्लिम दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य ताकत है। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि रह चुके हैं — यह भारत-मिस्र की गहरी रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक था। लेकिन अगर काहिरा अब इस्लामिक NATO की तरफ झुकता है, तो वह भारत के लिए एक कूटनीतिक नुकसान होगा जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा खतरा स्वेज नहर को लेकर है। मिस्र इस नहर को नियंत्रित करता है, जो भारत के यूरोप और पश्चिमी एशिया के साथ समुद्री व्यापार की मुख्य जीवन रेखा है। भारत का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है — तेल, माल, निर्यात, सब कुछ। अगर मिस्र पाकिस्तान और तुर्की के साथ सैन्य समझौते में बंध जाता है, तो किसी भी भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में भारत के पश्चिमी व्यापार मार्ग और समुद्री सुरक्षा सीधे खतरे में पड़ सकती है। यह केवल एक राजनीतिक चिंता नहीं है — यह भारत की आर्थिक सुरक्षा का सवाल है।
एर्दोगन ने इंटरव्यू में होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने को प्राथमिकता बताया और कहा कि इसके लंबे समय तक बंद रहने से किसी का भला नहीं होगा। उन्होंने क्षेत्रीय संघर्षों में मध्यस्थता की भूमिका निभाने के लिए कतर की सराहना भी की। साथ ही उन्होंने वादा किया कि तुर्की लेबनान, सीरिया और गाजा को अकेला नहीं छोड़ेगा और सीरिया में स्थिरता के लिए पूरी ताकत लगाएगा। एर्दोगन ने अपनी सीरिया यात्रा की योजना का भी जिक्र किया और कहा कि कुर्द समुदायों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी — यह एक उल्लेखनीय बदलाव है, क्योंकि तुर्की दशकों तक कुर्दों को आतंकवादी मानता रहा है।
भारत के नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि यह गठबंधन अभी शैशव अवस्था में है, लेकिन इसकी दिशा स्पष्ट है। पाकिस्तान, जो भारत का सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा है, इस गठबंधन का संस्थापक सदस्य है। तुर्की पहले से ही कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करता रहा है। और अब अगर मिस्र भी इस धुरी में शामिल होता है, तो भारत को अपनी पश्चिमी रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। भारत की कूटनीतिक सक्रियता, नौसैनिक तैयारी और वैकल्पिक व्यापार मार्गों पर निवेश — ये तीनों अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गए हैं। यह वक्त सतर्क रहने का है, न कि इंतजार करने का।

