अंग्रेज़ कोहिनूर नहीं लौटाते, और अब सेठ जुम्मा लाल रूठिया का कर्ज़ भी नहीं। मध्य प्रदेश के सीहोर के रूठिया परिवार ने एक ऐसा दावा ठोका है जो भारत-ब्रिटेन के बीच सदियों पुराने शोषण की कहानी को एक बार फिर ज़िंदा कर देता है।
बात 1917 की है — प्रथम विश्व युद्ध का दौर। सेठ जुम्मा लाल रूठिया, सीहोर के एक बड़े और प्रभावशाली कारोबारी, ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को 35,000 रुपये उधार दिए थे। यह कोई मौखिक वादा नहीं था — परिवार के पास दस्तावेज़ी सबूत मौजूद हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभाल कर रखे गए। 1937 में सेठ जी के निधन के बाद उनकी वसीयत के ज़रिए ये मूल कागज़ात उनके बेटे मानकचंद्र रूठिया को मिले, और आज भी परिवार उन्हें थामे हुए है।
अब 109 साल बाद रूठिया परिवार ने ब्रिटेन के ऋण प्रबंधन कार्यालय (UK Debt Management Office) से संपर्क किया है और जवाब भी मिला है। लेकिन असली लड़ाई अभी शुरू होती है — क्योंकि ब्रिटिश कानून में सामान्य कर्ज़ वसूली के लिए मात्र छह साल की समय-सीमा तय है। 109 साल की यह देरी खुद एक बड़ी कानूनी दीवार बन जाती है, जिसे परिवार को पार करना होगा।
कानूनी पेचीदगी यहीं नहीं रुकती। 1947 में भारत की आज़ादी के बाद दोनों देशों के बीच कई वित्तीय दायित्वों का निपटारा अलग-अलग समझौतों से हो चुका था। ब्रिटेन में सरकार के खिलाफ दीवानी कार्रवाई के लिए 1947 का Crown Proceedings Act लागू होता है। यानी रूठिया परिवार को सिर्फ यह साबित नहीं करना कि पैसे दिए गए थे — उन्हें यह भी सिद्ध करना होगा कि आज की ब्रिटिश सरकार उस ऐतिहासिक देनदारी की कानूनी उत्तराधिकारी है और वह देनदारी कभी वैध रूप से चुकता नहीं हुई।
अब असली सवाल — 1917 के 35,000 रुपये आज कितने होंगे? उस ज़माने में एक तोला सोने की कीमत करीब 27 रुपये 2 आने थी, यानी 35,000 रुपये में लगभग 1,287 तोला — करीब 15 किलो सोना खरीदा जा सकता था। आज उस सोने की कीमत लगभग 22 करोड़ रुपये बनती है। खरीद क्षमता के हिसाब से देखें तो यह रकम और भी बड़ी हो जाती है। लेकिन अंतिम आंकड़ा पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि मूल दस्तावेज़ में ब्याज दर, भुगतान की शर्तें और मूल्यांकन का तरीका क्या दर्ज था।
यह मामला सिर्फ एक परिवार की लड़ाई नहीं है। यह उस बड़े सवाल की एक छोटी-सी झलक है जो भारत सदियों से पूछता आया है — 200 साल की लूट का हिसाब कौन देगा? कोहिनूर से लेकर सेठ जुम्मा लाल के 35,000 रुपये तक, ब्रिटेन के पास जवाब नहीं हैं। रूठिया परिवार की यह हिम्मत, यह दस्तावेज़ी ज़िद, एक याद दिलाती है — भारत का इतिहास भूलता नहीं।

