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94 दिन, 3 ऑपरेशन, एक चमत्कार — बेंगलुरु के डॉक्टरों ने गैस्ट्रोस्किसिस से पीड़ित नवजात को दी नई जिंदगी

94 दिन, 3 ऑपरेशन, एक चमत्कार — बेंगलुरु के डॉक्टरों ने गैस्ट्रोस्किसिस से पीड़ित नवजात को दी नई जिंदगी

यह केस इतना असाधारण क्यों है?

कुछ कहानियाँ सिर्फ खबर नहीं होतीं — वे इंसानी जज्बे और medical science की ताकत का जीता-जागता सबूत होती हैं। बेंगलुरु के कायरान हॉस्पिटल में जो हुआ, वो ठीक ऐसा ही है। एक नवजात शिशु, जिसका वजन महज 1.8 किलोग्राम था, जो गैस्ट्रोस्किसिस — यानी पेट की दीवार की एक दुर्लभ जन्मजात विकृति — से पीड़ित था, उसे 94 दिनों की अथक लड़ाई और तीन जटिल ऑपरेशनों के बाद जीवनदान मिला। दावा यह है कि इन परिस्थितियों में — जहाँ आंतें बाहर निकली हों, संक्रमित हों और विकृत हो चुकी हों — देश के किसी बड़े मेडिकल संस्थान ने भी अब तक ऐसा सफल केस दर्ज नहीं किया था। कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. आरके त्रिपाठी भी इसे देश का दुर्लभतम सफल केस मानते हैं।

गैस्ट्रोस्किसिस आखिर होता क्या है?

गैस्ट्रोस्किसिस एक जन्मजात विकार है जिसमें शिशु के पेट की दीवार में एक छेद रह जाता है और आंतें — कभी-कभी अन्य अंग भी — शरीर के बाहर लटकी रहती हैं। यह स्थिति हर 2,500 से 3,000 नवजातों में से किसी एक को होती है। अस्पताल के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. वाईके पुनिया बताते हैं कि सामान्य गैस्ट्रोस्किसिस भी चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन इस केस में स्थिति और भी गंभीर थी — आंतें न केवल बाहर थीं, बल्कि संक्रमण की वजह से वे सूजकर विकृत हो चुकी थीं और मांस के लोथड़े जैसी दिखने लगी थीं। ऐसे में हर सेकंड की देरी शिशु की जान पर भारी पड़ सकती थी, और डॉक्टरों के सामने एक ऐसी चुनौती थी जिसका कोई आसान रास्ता नहीं था।

यह सब शुरू कैसे हुआ?

बेंगलुरु निवासी सलादुद्दीन अकील, जो पेशे से ठेकेदार हैं, की पत्नी शादमीन अपनी तीसरी संतान के जन्म के लिए मुरादाबाद स्थित मायके आई थीं। मार्च के अंतिम सप्ताह में शादमीन को असहनीय पीड़ा शुरू हुई और 3 अप्रैल को डिलीवरी हुई। जन्म लेते ही स्पष्ट हो गया कि शिशु गंभीर रूप से बीमार है — उसकी आंतें पेट के बाहर लटकी थीं, संक्रमित थीं और सूजी हुई थीं। शिशु का वजन केवल 1.8 किलोग्राम था, जो पहले से ही उसे high-risk category में रखता था। परिवार के लिए यह दृश्य दिल दहला देने वाला था, लेकिन कायरान हॉस्पिटल की medical team ने तुरंत एक्शन लिया।

तीन ऑपरेशन — हर बार मौत से टक्कर

जन्म की रात ही पहला ऑपरेशन किया गया जिसमें बाहर निकली आंतों को वापस अंदर करने की कोशिश हुई। लेकिन सूजन इतनी अधिक थी कि पेट में जगह ही नहीं थी — फेफड़ों और अन्य अंगों पर दबाव बढ़ गया। शिशु को तुरंत ventilator पर रखा गया ताकि सांसें जारी रहें। चूँकि आंतें पोषण अवशोषित करने की स्थिति में नहीं थीं, इसलिए Total Parenteral Nutrition (TPN) — यानी central line के जरिए सीधे नसों में पोषण देने की प्रक्रिया — शुरू की गई। शरीर में sodium chloride और platelets का स्तर भी लगातार अनियमित बना रहा, और जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती थी। जन्म के 35 दिन बाद दूसरा ऑपरेशन हुआ जिसमें बंद आंत को खोला गया — इस प्रक्रिया को एट्रेजिया करेक्शन कहते हैं। लगातार निगरानी और उपचार से आंतों की स्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगी। जन्म के पूरे 94 दिन बाद तीसरा और अंतिम ऑपरेशन किया गया, जिसके बाद दो दिन की intensive monitoring में शिशु की हालत स्थिर रही — और यह संकेत था कि अब जिंदगी खतरे से बाहर है।

इस जीत के पीछे क्या था — सिर्फ skill या कुछ और भी?

डॉ. पुनिया स्पष्ट करते हैं कि इस तरह के दुर्लभतम केस में केवल एक सर्जन की काबिलियत काफी नहीं होती। Neonatology, pediatric surgery, critical care — इन सभी विभागों की एक unified team का 100% समर्पण और 24 घंटे की intensive care इस जीत की असली बुनियाद थी। यह वही medical excellence है जो आज भारत के tier-2 और tier-3 शहरों तक पहुँच रही है — एक ऐसा India जो सिर्फ IT और startups में नहीं, बल्कि healthcare innovation में भी दुनिया को चुनौती दे रहा है। करीब 95 दिन बाद जब शादमीन ने अपने बेटे को गोद में लिया, तो सलादुद्दीन ने उसका नाम यूसुफ रखा और डॉ. पुनिया की मेहनत को “चमत्कार” बताते हुए उन्हें एक shield भेंट की — एक पिता की तरफ से उस team के लिए जिसने उनके बेटे को जीवन दिया।

इस केस से हमें क्या सीखना चाहिए?

यूसुफ की कहानी सिर्फ एक medical miracle नहीं है — यह एक reminder है कि भारत की healthcare system में असाधारण talent मौजूद है, जरूरत है तो बस उसे सही resources और recognition देने की। गैस्ट्रोस्किसिस जैसी दुर्लभ बीमारियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है ताकि families को पता हो कि early diagnosis और तुरंत specialized care से जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं। डॉ. पुनिया और उनकी team ने जो किया, वो सिर्फ एक नवजात को नहीं बचाया — उन्होंने यह साबित किया कि जब भारतीय doctors ठान लें, तो वे इतिहास रच सकते हैं। यह है असली New India — जहाँ हर जिंदगी की कीमत है, और science उसे बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।

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